भगवान विष्णु स्वयं आते है यहां विश्राम करने, जाने मंदिर के विषय में

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Lord Vishnu himself comes here to rest, know about the temple
भगवान विष्णु स्वयं आते है यहां विश्राम करने, जाने मंदिर के विषय में

छत्तीसगढ़ पुरातात्विक स्थलों से भरा हुआ है। इतिहास की बात करे तो यहां पर राज करने वाले राजाओं व राजवंशों के विषय में भी बहुत जानकारी उनके स्थापत्य कला व शिल्पकला से प्राप्त होता है। कई ऐसे निर्माण है जो लोगों को आश्चर्य में डाल देते है। उन्हीं में से एक मंदिर है राजिम में। जहां पर श्री हरि विष्णु राजिव लोचन मंदिर में विराजमान है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि यहां पर मंदिर में विश्राम करने के लिए स्वयं श्रीहरि विष्णु आते है। इस लेख के माध्यम से हम इस मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक व पौराणिक जानकारी देंगे। साथ ही यहां की विशेषता बताएंगे।

राजिम में है राजिव लोचन मंदिर


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के समीप राजिम में भगवान विष्णु के चार रूपों को समर्पित भगवान राजीव लोचन का मंदिर है। राजिव लोचन मंदिर मे चारों धाम की यात्रा होती है। यहां पर भगवान विष्णु चारों कोनो में चार रूपों में दिखाई देते है। भगवान राजीव लोचन का यह मंदिर हर त्योहार में बदल जाता है।

छत्तीसगढ़ का प्रयाग है राजिम


लोक मान्यता के अनुसार जीवनदायिनी नदियां सोंढूर, पैरी व महानदी संगम पर बसा है। इस नगर को अर्धकुंभ के नाम से भी जाना जाता है। माघ पूर्णिमा में यहां भव्य मेला लगता है। जिसमें देशभर के श्रद्धालु शामिल होते है। राजीव लोचन मंदिर में प्राचीन भारतीय संस्कृति व शिल्पकला का अनोखा समन्वय नजर आता है। आठवीं-नौवीं सदी के इस प्राचीन मंदिर में बाहर स्तंभ है। इन स्तंभों पर अष्ठभुजा वाली दुर्गा, गंगा, यमुना और भगवान विष्णु के अवतार राम और नसिंह भगवान के चित्र अंकित है। लोक मान्यता यह भी है कि इस मंदिर में साक्षात भगवान विष्णु विश्राम करने के लिए आते है।

सांस्कृतिक केन्द्र है प्रदेश का


सोंढूर, पैरी व महानदी के संगम के पूर्व में बसा राजिम अत्यंत प्राचीन समय से छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं कला की अमूल्य निधि संजोए इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और कलानुरागियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ हैं।

प्रयाग के नाम से प्रचलित


श्रद्धा, तर्पण, पर्वस्नान, दान आदि धार्मिक कृत्यों के लिए इसकी सार्वजनिक महत्ता आंचलिक लोगों में पारंपरिक आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास की स्वाभाविक परिणति के रूप में प्रवाहमान है। क्षेत्रीय लोग इस संगम को प्रयाग संगम के समान ही पवित्र मानते है। इनका विश्वास है कि यहां स्नान करने मात्र से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते है। मृत्यु के उपरांत वह विष्णुलोक प्राप्त करते है। यहां का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है।

पर्वायोजन माघ मास की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि तक चलता है। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से सहस्त्रों यात्री संगम स्नान करने और भगवान राजीव लोचन एवं कुलेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिए आते है। मान्यता यह भी है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा उस समय तक पूरी नहीं होती जब तक राजिम की यात्रा नहीं कर ले।

ये है पुरातात्विक मंदिर


राजिम के देवालय ऐतिहासिक और पुरातात्विक दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। इन्हें इनकी स्थिति के आधार पर चार भागों में देखा जाता है। पश्चिमी समूह में कुलेश्वर नौवी शताब्दी का मंदिर, पंचेश्वर नौवी शताब्दी का मंदिर और भूतेश्वर महादेव 14वीं शताब्दी का मंदिर। मध्य समूह में राजीव लोचन मंदिर 7वीं सदी में निर्मित, वामन, वाराह, नृसिंह, बद्रीनाथ, जगन्नाथ, राजेश्वर व राजिम तेलिन मंदिर। पूर्व समूह में रामचंद्र का मंदिर 8वीं सदी का है। उत्तरी समूह में सोमेश्वर महादेव का मंदिर है।

कैसे पहुंचे यहां


प्रदेश की राजधानी रायपुर से राजिम लगभग 45 किलोमीटर दूर है। यहां पर बस, टैक्सी व दो पहिया वाहन से भी पहुंच सकते है। यहां रूकने के लिए छत्तीसगढ़ पर्यटन मंउल का पुन्नी रिसाॅर्ट एवं पीडब्ल्यूडी का विश्रामगृह भी है।


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