शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई, जाने इस लेख में

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भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे महत्वपूर्ण माह सावन का महीना चल रहा है। महादेव के लिंग रूप में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। श्रावण मास के सोमवार में खास तौर पर व्रत व पूजन किया जाता है। इस लेख के माध्यम से हम बताएंगें कि आखिर शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई और इसकी पूजा क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है।
छेवों के देव महादेव शंकर भगवान से जुड़ी जो सबसे खास बात है वो यह है कि केवल शिव ही है जिन्हें मूर्ति और निराकार लिंग दोनों रूपों में पूजा जाता है। शिवलिंग की पूजा-अर्चना कर ही मनुश्य के समस्त दुःखों का अंत होता है। साथ ही महादेव अपने भक्त के मनोरथ को पूर्ण करते है।

मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा समस्त ब्रम्हाण्ड की पूजा के बराबर मानी जाती है। क्योंकि शिव ही समस्त जगत के मूल है। शिवलिंग के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो शिव का अर्थ परम कल्याणकारी और लिंग का अर्थ होता है सृजन। लिंग का अर्थ प्रतीक चिन्ह होता है।

शिवलिंग का महत्व

शिवलिंग के संदर्भ में स्कंदपुराण में आकाश को भी लिंग स्वरूप माना गया है। शिवलिंग वातावरण सहित घूमती हुई पृथ्वी तथा समस्त अनंत ब्रम्हाण्ड की धुरी है। शिवलिंग का अर्थ अनंत भी है जिसका मतलब है कि इसका कोई अंत नहीं है न ही प्रांरभ है।

वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में प्रत्येक महायुग के बाद समस्त संसार इसी शिवलिंग में मिल जाता है फिर संसार इसी शिवलिंग से सृजन होता है। इसलिए विश्व की संपूर्ण उर्जा का प्रतीक शिवलिंग को माना गया है। लिंग शिव का ही निराकार रूप है। मूर्ति रूप में शिव की भगवान शंकर के रूप में पूजा होती है।

शिवलिंग का इतिहास कई हजार वर्षों पुराना है। आदिकाल से शिव के लिंग की पूजा प्रचलित है। सभी देवी-देवताओं में शिव की एक मात्र भगवान है जिनके लिंग स्वरूप की आराधना की जाती है। इस संदर्भ में कई कथाएं और मान्यताएं है।
कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय में विष समाप्त करने के लिए शिव ने सारा विष अपने कंठ में रख लिया। शिव का कंठ विष पीकर नीले रंग का हो गया। वह नीलकंठ कहे जाने लगे। लेकिन विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ़ गया।

उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई जो आज भी चली आ रही है। शिवलिंग को भगवान शिव का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। इसकी पूजा विधि-विधान से की जाती है।

ऐसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति

लिंग महापुराण के अनुसार एक बार भगवान ब्रम्हा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता का विवाद हो गया। जब उनका विवाद बहुत अधिक बढ़ गया तब अग्नि की ज्वालाओं से लिपटा हुआ लिंग भगवान ब्रम्हा और विष्णु के बीच आकर स्ािापित हुआ था।

दोनों उस लिंग का रहस्य नहीं समझ पाए। इस रहस्य के बारे में विष्णु भगवान और ब्रम्हा ने हजारों वर्षों तक खोज की फिर भी उन्हें लिंग का स्त्रोत नहीं मिला। निराश होकर दोनों देव फिर से वहीं आ गए जहां उन्होंने लिंग को देखा था। वहां आने पर उन्हें ओम की ध्वनि सुनाई दी। जिसको सुनकर उन्हें अनुभव हुआ कि यह कोई शक्ति है

और उस ओम के स्वर की आराधना करने लगे। भगवान ब्रम्हा और भगवान विष्णु की आराधना से प्रसन्न होकर उस लिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और सद्बुद्धि का वरदान दिया। देवों को वरदान देकर भगवान शिव चले गए और एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए।

यही भगवान शिव का पहला शिवलिंग माना गया है। सबसे पहले भगवान ब्रम्हा और विष्णु ने शिव के उस लिंग की पूजा-अर्चना की थी तब से भगवान शिव की लिंग रूप में पूजा करने की परंपरा की शुरुआत हुई। भगवान विष्णु व ब्रम्हा ने मान लिया कि देवों के देव व श्रेष्ठ महादेव ही है।

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