श्री कृष्ण की पसंदीदा गाय बहुला की क्यों होती है पूजा, जाने यहां

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भगवान श्री कृष्ण के कई नाम है। गोविंद नाम से श्रीकृष्ण को संबोधित करते है। गोविंद का अर्थ होता है गौ की रक्षा करने वाला। श्रीकृष्ण ने एक यादव व ग्वाले के रूप में गौ रक्षा का संदेश दिया। भगवान श्रीकृष्ण की एक गाय थी बहुला जिसे भगवान ने स्वयं ही आशीर्वाद दिया था। जिसके पूजा के लिए बहुला चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है। आज इस लेख के माध्यम से हम बहुला चैथ से जुड़ी कथाओं व व्रत पूजा की विधि को बताएंगे।
बहुला चतुर्थी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को कहा जाता है। यह तिथि बहुला चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। इस दिन भगवान गणेश के लिए भी व्रत किया जाता है। वर्ष भर में चार चतुर्थियों में से एक यह भी है इस दिन भगवान गणेश के निमित्त व्रत को माएं अपने पुत्रों की रक्षा के लिए रखती है। बहुला चतुर्थी के दिन गेहंू व चावल से निर्मित वस्तुएं भोजन में ग्रहण करना वर्जित माना गया है। गाय तथा शेर की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजन करने का विधान है।

बहुला चतुर्थी व्रत की विधि

इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होने के पश्चात स्नान आदि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। व्रती को पूरा दिन निराहार रहना होता है। संध्या समय में गाय माता तथा उसके बछड़े की पूजा की जाती है। भोजन में कई तरह के पकवान बनाए जाते है। जिन खाद्य पदार्थों को बनाया जाता हे। उन्हीं का संध्या समय में गाय माता को भोग लगाया जाता है। भारत के कुछ भागों में जौ तथा सत्तू का भी भोग लगाया जाता है। बाद में इसी भोग लगे भोजन की स्त्रियां ग्रहण करती है। इस दिन गाय तथा सिंह की मिट्टी की मूर्ति का पूजन भी किया जाता है। संध्या समय पूरे विधि-विधान से प्रथम पूजनीय भगवान गणेश की पूजा की जाती है। रा़ित्र में चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें अध्र्य दिया जाता है। कई स्थानों पर शंख में दूध, सुपारी, गंध तथा अक्षत से भगवान श्रीगणेश और चतुर्थी की तिथि की पूजा की जाती है। इस प्रकार से संकष्ट चतुर्थी का पालन भी होता है।

बहुला चतुर्थी की है प्रचलित कथा

बहुला चतुर्थी से संबंधित एक बड़ी ही रोचक कथा प्रचलित है। जब भगवान विष्णु का कृष्ण रूप में अवतार हुआ। तब इनकी लीला में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप अवतार लिया। कामधेतु नाम की गाय के मन में भी कृष्ण की सेवा का विचार आया और अपने अंश से बहुला नाम की गाय बनकर नंद बाबा की गौशाला में आ गई। भगवान श्रीकृष्ण का बहुलाा गाय से बड़ा स्नेह था। एक बार श्रीकृष्ण के मन में बहुला की परीक्षा लेने का विचार आया। जब बहुला वन में चर रही थी तब भगवान सिंह रूप में प्रकट हो गए। मौत बनकर सामने खड़े सिंह को देखकर बहुला भयभीत हो गई। लेकिन हिम्मत करके सिंह से बोली हे वनराज मेरा बछड़ा भूखा है।

बछड़े को दूध पिलाकर मैं आपका आहार बनने वापस आ जाउंगी। सिंह ने कहा कि सामने आए आहार को कैसे जाने दूं तुम वापस नहीं आई तो मैं तो भूखा ही रह जाउंगा। बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ लेकर कहा कि मैं अवश्य वापस आउंगी। बहुला की शपथ से प्रभावित होकर सिंह बने श्रीकृष्ण ने बहुला को जाने दिया। बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस वन में आ गई। बहुला की सत्यनिष्ठा देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में आकर कहा कि हे बहुला तुम परीक्षा में सफल हुई। अब से भाद्रपद चतुर्थी के दिन गौ माता के रूप में तुम्हारी पूजा होगी। तुम्हारी पूजा करने वाले को धन और संतान का सुख मिलेगा।

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