भगवान शिव के मस्तक पर क्यों विराजमान है चंद्रमा, जाने कारण

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भोले नाथ सभी देवी-देवताओं से बहुत अलग है। हिन्दू धर्म में लगभग सभी देवी-देवताओं की वेशभूषा अलग रहती है। जब हम देवताओं के बारे में बात करते है तो उनकी छवि सुंदर वस्त्र-आभूषण पहने हुए नजर आते है।

वहीं इन सभी देवी-देवताओं में सबसे अलग व निराले है महादेव। उनकी वेशभूषा ही भिन्न है वे गले में सर्प की माला, शरीर में सिंह की खाल, रुद्राक्ष की माला धारण किए हुए। त्रिशूल व डमरू हाथों में लिए हुए दिखते है।

उनकी वेशभूषा में एक चीज और भी खास है जिसे अक्सर गौर किया जाता है जो है चंद्रमा। यह चंद्रमा आखिर क्यों महादेव के मस्तक पर विराजमान है। इस विषय में हम अपने लेख के माध्यम से बताएंगे।

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हिन्दू धर्म के सभी देवताओं में शिव का अग्रणी स्थान है भगवान शिव को निराकार और क्रोध का देवता माना जाता है। अन्य देवताओं की अपेक्षा इनका रंग रूप वेशभूषा बहुत ही अलग है।

महादेव देखने में जैसे है वैसा वे बिलकुल भी नहीं है देवता होने के बाद भी वे किसी तरह का सुख नहीं भोगते है वे तो बस अपने भक्तों का कल्याण करते है।

सौम्य माने जाते है चंद्र देव

चंद्रमा को सौम्य माना जाता है। वे शीतलता प्रदान करते है। शिव पुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव ने इस ब्रम्हाण्ड और सृष्टि की रक्षा के लिए समुद्र मंथ से निकले विष को पी लिया था।

विष के प्रभाव से जब भगवान शंकर का शरीर गर्म होने लगा तब चंद्रमा ने भोलेशंकर के सिर पर विराजमान होकर उन्हें शीतलता प्रदान करने की प्रार्थना की। लेकिन शिव ने चंद्रमा के आग्रह को नहीं माना।

जब भगवान शंकर विष के तीव्र प्रभाव को सहन नहीं कर पाए तब देवताओं ने सिर पर चंद्रमा को धारण करने का निवेदन किया। जब भगवान शिव ने चंद्रमा को धारण किया तब विष की तीव्रता कम होने लगी। तभी से शिव के मस्तक पर चंद्रमा विराजमान है।

चंद्रमा से जुड़ी है पौराणिक कथा

इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं भी है जिसमें एक पौराणिक कथा के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी 27 नक्षत्र कन्याओं का विवाह चंद्र के साथ्ज्ञ किया था लेकिन चंद्र इनमें से सिर्फ रोहिणी को ही अधिक प्रेम करते थे।

अन्य कन्याओं ने जब अपने पिता से चंद्र की शिकायत की तब दक्ष ने क्रोध में आकर चंद्र को क्षय रोग से ग्रसित होने का श्राप दे दिया। इसके बाद चंद्र का शरीर धीरे-धीरे क्षीण होने लगा तब नारदजी ने उन्हें शिव की आराधना करने के लिए कहा।

जब चंद्र की अंतिम सांसे चल रही थी तब प्रदोषकाल में शिव ने चंद्र को अपने सिर पर धारण करके उन्हें पुर्नजीवन प्रदान किया और क्षय रोग से उनकी रक्षा की। कहा जाता है तभी से चंद्रमा शिव के सिर पर है।

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