हरि प्रिया तुलसी की रविवार को क्यों नहीं होती पूजा, जाने इसका कारण

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हिन्दू धर्म में तुलसी पत्र का विशेष महत्व माना गया है। इसे सिर्फ पत्र नहीं अपितु देवी का स्थान दिया गया है। भगवान गणेश को छोडक़र समस्त देवी-देवताओं की पूजा में इसका उपयोग किया जाता है। तुलसी का इतना अधिक महत्व होने के बाद भी सप्ताह में एक दिन उनकी पूजा करना, उन्हे स्पर्श करना व उनके पत्र को तोडऩा मना है। इसके पीछे क्या कारण है इस विषय में बहुत सी बातें कहीं जाती है। लेकिन इसका वास्तविक कारण है इस लेख के माध्यम से बता रहे है।

० सूर्य देव के कारण नहीं होती रविवार को पूजा तुलसी की
तुलसी को हरि की प्रिया की संज्ञा दी गई है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद डॉ.दीपक शर्मा ने बताया कि सप्ताह में सात दिन में से एक दिन रविवार को मां तुलसी की पूजा करना वर्जित है। इसके पीछे कारण छिपा हुआ है। पुराणों में उल्लेख है कि तुलसी मां अपने पूर्व जन्म में शंखचूऱ नामक राजा की पत्नी थी। शंखचूर बहुत ही शक्तिशाली और अच्छा व्यक्ति था। वह लगातार साम्राज्य का विस्तार करते हुए आगे बढ़ रहा था जिससे देवी-देवता परेशान थे उन्होंने भगवान शंकर से अपनी व्यथा बताई। तब भगवान शंकर ने शंखचूर को अपने पास बुलाया और उससे अपने साम्राज्य का विस्तार न करने के लिए कहा साथ ही जितने देवी-देवताओं का साम्राज्य व क्षेत्र हासिल किया था उसे वापस करने कहा। तब शंखचूर ने भगवान शंकर से कहा कि हे प्रभु मैं एक राजा हूं और राजा का काम अपने साम्राज्य का विस्तार करना होता है। तो मैं इस कार्य को कैसे छोड़ सकता हूं। तब शिवजी ने उसे कहा कि तुम एेसा नहीं करोगे तो मैं तुमसे युद्ध करूंगा। शंखचूर अपने घर पहुंचा जहां पर देवी तुलसी जो उनकी पत्नी थी। उनसे शिवजी की कही सारी बातें बताई और भगवान शंकर के साथ युद्ध के लिए चला गया। भगवान का युद्ध चलता रहा लेकिन तुलसी के पत्नी व्रता होने के कारण शंखचूर का कुछ नहीं हुआ। तब भगवान शंकर ने विष्णु से लीला करने के लिए कही और इसका समाधान मांगा। तब भगवान विष्णु शंखचूर का रूप धारण कर तुलसी के पास पहुंचे।

जब वे पहुंचे तब दोपहर का समय था और तुलसी को लगा की शंखचूर युद्ध में विजयी होकर आए है और वह खुश होकर अपने पति को आलिंगन करने लगी। जिससे उनका पतिव्रत टूट गया। उधर शंखचूर भगवान शंकर से पराजित हुआ और मृत्यु को प्राप्त हुआ। जब शंखचूर का मृत शरीर तुलसी ने देखा तब वह भगवान विष्णु को तो श्राप देती है कि तुम पत्नी वियोग से पीडि़त होगे। व्यथित तुलसी को देखकर विष्णु ने उसे वरदान दिया। जिसके कारण वह हरि प्रिया बनी और समस्त पूजन के लिए महत्वपूर्ण मानी गई। वहीं जब यह सब घटना हुई तब दोपहर का समय था तब तुलसी ने सूर्य देव को वहां मौजूद होकर भी उसके पत्नीव्रत की रक्षा न करने व सहायता न करने के कारण श्राप दिया कि जब तुम्हारा दिन होगा उस दिन मेरी पूजा नही होगी। जो भी पूजा करेगा मैं उसके विनाश व दुर्भाग्य का कारण बनूंगी। तब से ही रविवार को तुलसी की पूजा वर्जित मानी गई है। इसके अलावा सूर्य संक्राति को भी तुलसी की पूजा व उसे तोडऩा वर्जित माना गया है।

० तुलसी से ही बना शंख व तुलसी का पौधा
जब देवी तुलसी सती हुई तब उसकी अस्थि से शंख बना और उसकी राख से ही तुलसी का पौधा बना। ये दोनों के बिना पूजन कार्य अधूरा रहता है। हर पूजा में तुलसी अर्पित किया जाता है और शंख बजाकर ही देवाताओं की पूजा होती है।

० इन दिनों में भी नहीं तोड़ा जाता तुलसी को
रविवार के अलावा सूर्य संक्राति, एकादशी व द्वादशी की तिथि को तुलसी पत्र को तोडऩा या खाना वर्जित माना गया है।

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