गीता के श्लोक का सार जाने इस लेख के माध्यम से, 4 थे श्लोक का महत्व पढ़े

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गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन का रहस्य बताया था। प्रत्येक लेख के माध्यम से हम एक-एक श्लोक के महत्व को बता रहे है।

आज के इस लेख में गीता के 4 थे श्लोक का विस्तार से वर्णन अभिषेक मिश्रा के मुताबिक बताया गया है। इस लेख में श्लोक अर्थ के साथ और उसका महत्व भी बता रहे है।

गीता का 4था श्लोक

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधिः।

युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः।।

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्।

पुरूजित्कुतिंभोजश्च शैब्यश्च नरपुंडगवः।।

युधामन्युश्च विक्रांत उत्तमौजाश्च वीर्यवान्।

सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः।।

श्लोक का अर्थ

इसमें दुर्योधन अपने शत्रु सेना के सूरवीरों का आकलन कर रहे थे। वो कहते है कि शत्रु सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले योद्धा है। भीम और अर्जुन जैसे सूर वीर है।

सात्यकी, विराट, राजा द्रुपद, दृष्टकेतु और चेकितान ऐसे अनेकों योद्धा और महारथी है। जाने इसका महत्व दुर्योधन ने जिस तरह युद्ध से पहले अपने शत्रुओं का आकलन करता है।

उसी प्रकार हर व्यक्ति अपने कर्म क्षेत्र में उसके युद्ध से पहले वह अपने विरोधियों का आकलन करता है। उसके मन में यह भय कर्म क्षेत्र में उतरने से पहले ही होता है कि वह अपने कार्य में सफल हो पाएगा या नहीं।

चाहे कोई भी कार्य हो उसमें सफलता या विफलता दोनों के होने की संभावना बराबर होती है। पर व्यक्ति विफलता से इतना ज्यादा डरता है कि कई मामलों में वह अपने विरोधियों को जानकर कार्य क्षेत्र में आता ही नहीं है।

सीख इस श्लोक से

अपने कार्य क्षेत्र में जाने से पहले अपने विरोधियों का आकलन अवष्य करना चाहिए। परंतु भयभीत नहीं होना चाहिए। क्योंकि किसी भी कार्य में सफलता और विफलता दोनों की संभावना बराबर होती है।

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4 COMMENTS

  1. सही जानकारी इस श्लोक से देने का प्रयास भाई अभिषेक ने किया बहुत-बहुत धन्यवाद

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