दीपोत्सव में किए जाने वाले पारंपरिक कार्य के विषय में जाने, यहां

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दीपावली त्योहार को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं, परंपराएं और रीति-रिवाज प्रचलित है। उनमें से कुछ का तो हिन्दू धर्म में उल्लेख है। लेकिन अधिकतर का स्थानीय संस्कृति और पहले से चली आ रही परंपरा से संबंध है।

दीपों का पर्व होने के कारण दीपावली बहुत सुंदर त्योहार माना जाता है। इस लेख के माध्यम से दीपोत्सव के पारंपरिक कार्यों को बताएंगे।

पांच दिनों का उत्सव है दीपोत्सव

यह त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। कार्तिक माह की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष द्वितीया तक यह त्योहार मनाया जाता है। जिसमें कार्तिक माह की अमावस्या को मुख्य दीपावली पर्व माना जाता है।

यानी धनतेरस से भाई दूज तक यह त्योहार चलता है। आज से लगभग 50 वर्ष पहले तक इस त्योहार को शहर और गांव में एक जैसा ही मनाया जाता था लेकिन अब आधुनिकता के चलते शहरों में इस त्योहार की रंगत और

रौनक बदल गई है। जबकि गांवों में भी अब इस त्योहार का परंपरागत रूप बदल रहा है।

दीपावली मनाने के कई है कारण

इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का स्वामी बनाया था और इंद्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकर प्रसन्नातापूर्वक दीपावली मनाई थी। इस दिन भगवान विष्णु ने नर सिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था।

इसी दिन समुद्रमंथन के बाद लक्ष्मी व धनवंतरि प्रकट हुए थे। इसी दिन भगवान राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे।

इसी दिन के ठीए कए दिन पहले श्री कृष्ण ने नरकासुन नामक राक्षस का वध किया था। यह दिन भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी है। गौतम बुद्ध के अनुयायियो्र ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

इसी दिन उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ था। इसी दिन गुप्तवंशीय राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने विक्रम संवत की स्थापना करने के लिए धर्म, गणित तथा ज्योतिष के दिग्गज विद्वानों को आमंत्रित कर मुहूर्त निकलवाया था।

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दीपावली के दिन ही सिक्खों के छटे गुरु हरगोबिंद सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था।

आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती का निर्वाण हुआ था। इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष आरंभ होता है। इन सभी कारणों से दीपोत्सव मनाया जाता हैं

दीपोत्सव के पारंपरिक कार्य का वर्णन

लिपाई-पुताई और नए कपड़े-इस त्योहार के आने के कई दिन पहले से ही घरों की लिपाई-पुताई सजावट प्रारंभ हो जाती है। वर्षा के बाद गंदगी होने के बाद घर और संपूर्ण शहर तथा गांव की इसी बहाने सफाई होती हैं।

दीपावली से पूर्व नए कपड़े भी बनवाए जाते है। मान्यता है कि लक्ष्मीजी इन दिनों में विशेष रूप से विचरण करती है। अतः जहां ज्यादा साफ-सफाई और साफ सुथरे लोग नजर आते है वहीं वह रम जाती है।

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धनवंतरि पूजा-दीपावली का शुभारंभ कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होता है। इसे धनतेरस कहा जाता है। आरोग्य के देवता धनवंतरि की आराधना की जाती है। इस दिन नए-नए बर्तन, आभूषण इत्यादि खरीदने की परंपरा है।

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बही खाता बदलना-धनतेरस के दिन व्यापारी अपनी दुकानों की साफ-सफाई करते है और नए बही खाते बनाते है। दीपोत्सव में ही व्यापारी अपने बही-खाते बदलते है तथा लाभ-हानि का ब्योरा तैयार करते है।

खरीददारी-इस दिन बाजारों चारों तरफ जन समूह उमड़ पड़ता है। बरतनों की दुकानों पर विशेष साज-सज्जा व भीड़ दिखाई देती है।

धनतेसर के दिन बरतन खरीदना शुभ माना जाता है। प्रत्येक व्यक्ति इस दिन अपनी आवश्यकता के अनुसार वस्तुएं खरीदता है। कोई इसी दिन वाहन खरीदता है तो कोई सोना या चांदी।

यम, कृष्ण और काली की पूजा- धनतेरस के बाद नरक चतुर्दशी का पर्व होता है। इसे रूप चैदस भी कहते है। इस दिन जल्दी उठकर अच्छे से स्नान किया जाता है और रात्रि में यम पूजा के लिए दीपक जलाए जाते है।

इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसो का तेल व पांच अन्न के दाने डालकर इसे घर की नाली की ओर जलाकर रखा जाता है।

यह दीपक यम दीपक कहलाता है। ऐसी धार्मिक धारणा है कि सुबह जल्दी तेल से स्नान कर देवी काली की पूजा करते है और उन्हें कुमकुम लगाते है।

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भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर राक्षस का वध कर उसके कारागार से 16 हजार कन्याओं को मुक्त कराया था। इसलिए इस दिन श्रीकृष्ण की भी पूजा का महत्व है।

लक्ष्मी जी की पूजा-धनतेरस के बाद नरक चतुर्दशी के बाद दीपावली का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी यानी विष्णु प्रिया की आराधना उनके दत्तक पुत्र गणेश के साथ की जाती है।

मान्यतानुसार महायोग और शुभ कारक लग्न देखकर रात्रि में लक्ष्मी पूजा का प्रचलन प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। दीपावली के दिन विशेष तौर पर लक्ष्मी पूजा का ही प्रचलन है।

लक्ष्मी कारक योग में पूजा करने से कर्ज से मुक्ति मिलती हैै तो दूसरी ओर अच्छी और शुद्ध भावना से लक्ष्मी की पूजा से धन और समृद्धि बढ़ती है।

गोवर्धन पूजा-दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट महोत्सव मनाया जाता है जिसे गोवर्धन पूजा का दिन भी कहते है। यह दिवाली की श्रृंखला में चैथा उत्सव होता है। लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन की पूजा करते है। इस दिन को द्यूत क्रीड़ा दिवस भी कहते है।

भाई-दूज-शुक्ल पक्ष द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है। रक्षाबंधन पर भाई अपनी बहन को अपने घर बुलाकर राखी का त्योहार मनाता है जबकि भाईदूज के दिन बहने भाई को तिलक लगाकर

भोजन कराकर उसे मिठाई देती है। यह दीपोत्सव का पांचवा और अंतिम दिन होता है। इसे यम द्वितीया भी कहते है। ये भाई-बहनों का त्योहार होता है। मान्यता है कि इस दिन भाई और बहन यमुना में स्नान करे तो यमराज निकट नहीं भटकता हैं

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