भगवान विश्वकर्मा और उनके परिवार के बारे में जाने विस्तार से, यहां

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प्राचीन ग्रंथो, उपनिषद एवं पुराण का अवलोकन करे तो पाएंगे कि आदि काल से ही विश्वकर्मा शिल्पी अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न मात्र मानवों में बल्कि देवगणों द्वारा भी पूजनीय व वंदित है।

भगवान विश्वकर्मा के अवष्किार व निर्माण कार्यों के संदर्भ में इंद्रपुरी, यमपुरी, वरूणपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी, सुदामापुरी, शिवमंडलपुरी आदि का निर्माण इनके द्वारा किया गया है। पुष्पक विमान का निर्माण किया।

सभी देवताओं के भवन और उनके दैनिक उपयोग होने वाले वस्तुएं भी इनके द्वारा ही बनाया गया है। कर्ण का कुंडल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशुल और यमराज का कालदंड सभी वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकमा ने ही किया है।

शिल्पशास्त्रों के प्रणेता बने भगवान विश्वकर्मा

शिल्पशास़्त्रों के प्रणेता बने स्वयं भगवान विश्वकर्मा जो ऋषशि रूप में सभी ज्ञानों का भंडार है। शिल्पों के आचार्य शिल्पी प्रजापति ने पदार्थ के आधार पर शिल्प विज्ञान को पांच प्रमुख धाराओं में विभाजित करते हुए

मानव समाज को इनके ज्ञान से लाभांवित करने के लिए निर्मित पाणच प्रमुख शिल्पाचार्य पुत्र को उत्पन्न किया। जो असय, काष्ट, ताम्र, शिला व हिरण्य शिल्प के अधिष्ठाता मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी एवं दैवज्ञा के रूप में जाने गए। ये सभी ऋषि वेदों में पारंगत थे।

कंद पुराण में है विस्तार से वर्णन

कंद पुराण में नागर खं में भगवान विश्वकर्मा के वंशजों की चर्चा की गई है। ब्रम्ह स्वरूप विराट श्री विश्वकर्मा पंचमुख है। उनके पांच मुख है जो पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण व ऋषियों को मंत्रों द्वारा उत्पन्न किए है।

उनके नाम है मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी व देवज्ञ। ऋषि मनु विश्वकर्मा- ये सानग गोत्र के कहे जाते है। ये लोहे के कर्म के उद्धगाता है। इनके वंशज लोहकार के रूप में जाने जाते है।

स्नातन ऋषि मय-ये सनातन गोत्र के कहें जाते है। ये बढ़ई के कर्म के उद्धगाता है। इनके वंशज काष्टकार के रूप में जाने जाते है।

अहभून ऋषि त्वष्ठा- इनका दूसरा नाम त्वष्ठा है। जिनका गोत्र अहंभन है। इनके वंशज ताम्रक के रूप में जाने जाते है।

प्रयत्न ऋषि शिल्पी-इनका दूसरा नाम शिल्पी है। जिनका गोत्र प्रयत्न है। इनके वंशज शिल्पकला के अधिष्ठाता है। इनके वंशज संगतराश भी कहलाते है। इन्हें मूर्तिकार भी कहते है।

देवज्ञ ऋषि-इनका गोत्र है सुर्पण। इनके वंशज स्वर्णकार के रूप में जाने जाते है। ये रजत, स्वर्ण धातु के शिल्पकर्म करते है।

परमेश्वर विश्वकर्मा के ये पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्ठा, शिल्पी और देवज्ञ शस्त्रादिक निर्माण करते है। लोकहित के लिए अनेकानेक पदार्थ उत्पन्न करने वाले तथा घर, मंदिर एवं भवन, मूर्तिया बनाने वाले, अलंकारों की रचना करने वाले है।

इनकी सारी रचनाएं लोकहितकारणी है। इसलिए ये पांच एवं वंदनीय ब्राम्हण है। यज्ञ कर्म करने वाले है इनके बिना कोई भी यज्ञ नहीं हो सकता।

मनु ऋषि भगवान विश्वकर्मा के सबसे बड़े पुत्र थे। इनका विवाह अंगिरा ऋषि की कन्या कंचना के साथ हुआ था। इन्होंने मानव सृष्टि का निर्माण किया है। इनके कुल अग्निगर्भ, सर्वतोमुख, ब्रम्ह आदि ऋषि उत्पन्न हुए।

भगवान विश्वकर्मा के दूसरे पुत्र मय महर्षि थे। इनका विवाह परासर ऋषि की कन्या सौम्या देवी के साथ हुआ था। इन्होंने इंद्रजाल सृष्टि की रचना किया है। इनके कुल में विष्णुवर्धन, सूर्यतंत्री, तंखपान, ओज, महोज इत्यादि महर्षि पैदा हुए।

तीसरे पुत्र महर्षि त्वष्ठा थे। इनका विवाह कौशिक ऋषि की कन्या जयंती के साथ हुआ था। इनके कुल में लोक त्वष्ठा, वर्धन, हिरण्यगर्भ, अमलायन ऋषि उत्पन्न हुए। वे देवताओं में पूजित ऋषि थे।

विश्वकर्मा के 4थे पुत्र महर्षि शिल्पी थे। इनका विवाह भृगु ऋषि के पुत्री करूणा के साथ हुआ। इनके कुल में बुद्धि, ध्रुन, हरितावश्व, मेधवाह नल, वस्तोष्यति, शवमुन्यु आदि ऋषि हुए है। इनकी कलाओं का वर्णन मानव जाति क्या देवगण भी नहीं कर पाए।

पांचवें पुत्र महर्षि देवज्ञ थे। इनका विवाह जैमिनी ऋषि की कन्या चंद्रिका के साथ हुआ था। इनके कुल में सहस्त्रातु, हिरण्यम, सूर्यगोविंद, लोकबांधव, अर्कषली ऋषि हुए।

इन पांच पुत्रों ने अपनी छीनी, हथौड़ी और अपनी उंगलियों से निर्मित कलाओं से दर्शकों को चकित कर दिया। उन्होंने अपने वंशजों को कार्य सौंप कर अपनी कलाओं को सारे संसार में फैलाया और आदि युग से आज तक अपने-अपने कार्य को संभालते चले आ रहे है।

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