छठ पूजा में खरना का है खास महत्व, जाने क्या होता है इस दिन

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छठ पूजा की शुरुआत हो चुकी है। छठ पूजा के दूसरे दिन यानी के 19 नवंबर को खरना होता है। खरना कार्तिक मास की पंचमी को नहाय खाए के बाद आता है। खरना को लोहंडा भी कहा जाता है।

खरना का विशेष महत्व माना जाता है। क्योंकि इस दिन व्रती दिन भर व्रत रखकर रात में खीर का प्रसाद ग्रहण करते है। वह भी प्रसाद गुड़ से बना होता है। इस लेख के माध्यम से हम खरना के महत्व को बताएंगे।

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चार दिन का है यह त्योहार

छठ पर्व केवल व्रत नहीं बल्कि एक कठिन तपस्या होता है। यह व्रत केवल एक या दो दिन का नहीं बल्कि चार दिन का होता है। इसमें पहला दिन नहाय खाए, दूसरा दिन खरना तथा तीसरा दिन शाम अघ्र्य और चैथा दिन सुबह अघ्र्य का होता है। व्रत रखने वाली महिलाएं बहुत पवित्रता से व्रत करती है और उन्हें परवैतिन कहा जाता है।

खास महत्व है खरना का

छठ में खरना का विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रत करने वाले व्यक्ति छठ पूजा पूर्ण होने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करता है। छठ में खरना का अर्थ है शुद्धिकरण। यह शुद्धिकरण केवल तन न होकर बल्कि मन का भी होता है।

इसलिए खरना के दिन केवल रात में भोजन करके छठ के लिए तन तथा मन को व्रती शुद्ध करता है। खरना के बाद व्रती 36 घंटे का व्रत रखकर सप्तमी को सुबह अघ्र्य देता हैं

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खीर बनती है खरना के दिन

खरना के दिन जो खास चीज होती है वह है खीर। इस दिन खीर गुड़ तथा साठी का चावल इस्तेमाल कर शुद्ध तरीके से बनायी जाती है। खीर के अलावा खरना की पूजा में मूली तथा केला रखकर पूजा की जाती है।

इसके अलावा प्रसाद में पूरियां, गुड़ की पूरियां तथा मिठाईयां व घी लगी रोटी होती है। छठ मइया को भोग लगाने के बाद ही इस प्रसाद को व्रत करने वाला व्यक्ति ग्रहण करता है। खरना के दिन व्रती का यही आहार होता है।

खरना के दिन बनाया जाने वाला खीर प्रसाद हमेशा नए चूल्हे पर बनता है। साथ ही इस चूल्हे की एक खास बात यह होती है कि यह मिट्टी का बना होता है। प्रसाद बनाते समय चूल्हे में इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी आम की होती है। दूसरे पेड़ों की लकड़ियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

खरना ग्रहण करने के है नियम

खरना के दिन व्रत रखने वाला व्यक्ति प्रसाद ग्रहण करता है। तो घर के सभी सदस्य शांत रहते है और कोई शोर नहीं करता क्योंकि शोर होने के बाद व्रती प्रसाद खाना बंद कर देतो है।

घर के सभी सदस्य व्रत करने वाले का प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही भोजन ग्रहण करते है।

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