जैन धर्म में संवत्सरी का प्रतिक्रमण का महत्व बताया जैन मुनि श्री पंथक ने

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बिलासपुर-टिकरापारा स्थित जैन भवन में परम पूज्य गुरुदेव पंथक मुनि महाराज साहब ने प्रतिक्रमण के बारे में बताया कि धर्म में पर्युषण का महापर्व आठ दिन की अवधि से मनाया जाता है । उसमें से आखिरी दिन संवत्सरी पर्व कहा जाता है । इन आठ दिनों के दरमियान आत्मा को कर्मों से हल्का पन करने के उद्देश्य उपवासए ब्रह्मचर्य का पालन भोजन में हरी सब्जियों का त्यागए स्नान त्याग आदि व्रत और तपस्या की जाती है ।

आठवें दिन को साल भर में हमारे द्वारा अज्ञानता मोह शौक पूरा करने के लिए अपने जीवन व परिवार को गुजारा करने की वजह से आदि कारणों से भूलवश कई किस्म किस्म के छोटे.बड़े जीवों का प्राण खत्म किया है ।

उसका पूरा अंतःकरण पूर्वक की याद करके पूरे पाप कर्मों की आलोचना की जाती है । यानी कि पश्चाताप व्यक्त करते हैं । इस पश्चाताप को व्यक्त करके की जो क्रिया है वह विधि को प्रतिक्रमण कहा जाता है । अगर ऐसा साल भर के किए हुए पापों का प्रतिक्रमण यदि नहीं किया जाता है। तो पाप कर्मों का हिसाब किताब कर्म राजा के कब्जे में चला जाता है ।

वह बाद में कभी भी हजार गुना बढ़कर सजा का फरमान करते हैं । जो कि जीवों को भुगतान का बहुत भारी पड़ जाता है । अगर आज संवत्सरी का प्रतिक्रमण कर लिया तो साल भर का बहुत सारे छोटे-मोटे कर्म भुगतान किए बगैर खत्म हो जाते हैं यदि ऐसा इस प्रकार प्रतिक्रमण के माध्यम से छोटे- मोटे कर्म तो खत्म हो जाते हैं ।

लेकिन भविष्य में इसी प्रकार का पाप कर्म नहीं करने की जागरूकता रहती है । यह संस्कार अगले कई जन्मों में भी ऐसे लक्षण आ जाते हैं।

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