कृषि कार्य में सहयोग करने वाले पशुधन को कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है पोला, जाने पर्व का महत्व

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पोला का पर्व प्रदेश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य भारत देश का ऐसा राज्य है। जो 80 प्रतिशत कृषि प्रधान राज्य है। यहां के निवासी पूरे वर्ष भर खेती का कार्य करते है। धान यहां का प्रमुख फसल है।

यहां के निवासियों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखा है। साल भर लोक पर्वों को उत्साह व उमंग के मनाया जाता है। लोक संस्कृति व सभ्यता की दृष्टि से भी प्रदेश समृद्ध माना जाता है। प्रत्येक पर्व का विशेष महत्व होता है।


कृषि कार्य से जुड़े कृषक व प्रदेश के लोग हर साल अपने कार्य में सहयोग करने वालों का धन्यवाद ज्ञापित करते है। पोला पर्व भी उन्हीं में से एक है। हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं के अलावा हर उस व्यक्ति को पूजनीय माना जाता है। जो हर वक्त उसके कार्य में सहयोग करता है।

कृषि कार्य की प्रधानता के कारण हर साल पोला पर्व के माध्यम से बैलों का धन्यवाद ज्ञापित किया जाता है। वर्ष भर कृषक के कृषि कार्य में बैल ही सहयोग करते है। इसलिए पोला पर्व गौ धन अथवा कृषि कार्य में सहयोग करने वाले पशु को समर्पित माना जाता है। इस लेख के माध्यम से हम पोला पर्व के महत्व को बताएंगे।

18 अगस्त को मनाया जाएगा पर्व

पोला का पर्व भाद्र पद के अमावस्या की तिथि को मनाया जाता है। इस बार 18 अगस्त को यह पर्व मनाया जाएगा। कृषि का दूसरे चरण का कार्य इस दौरान पूरा होता है। निंदाई-कोड़ाई के कार्य के बाद यह पर्व मनाया जाता है। हर घर में बैलों की पूजा-अर्चना की जाएगी।

जिसके घर बैल है वे साक्षात पूजा करेंगे। जहां पर लोगों के घर में बैल नहीं है वे मिट्टी अथवा लकड़ी के बैल की विधि-विधान से पूजा करेंगे। साथ ही पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भोग भी अर्पित किया जाएगा। ये सभी भोग अन्न से ही तैयार किए जाएंगे।

तीजा पर्व की शुरूआत

पोला का पर्व छत्तीसगढ़ में पोरा के नाम से जाना जाता है। पोला पर्व के साथ ही छत्तीसगढ़ में तीज पर्व की शुरूआत मानी जाती है। प्रदेश में सदियों से परंपरा भी चली आ रही है। इस दिन से ही बेटियों को तीज पर्व के लिए लिवाने का कार्य भाई व पिता करते है। तीज का पर्व बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। इस पर्व को बेटियां अपने मायके में ही मानती है।

अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है पर्व

पोला पर्व को छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, हिमाचल, उत्तराखंड, असम, सिक्किम तथा पड़ोसी देश नेपाल में भी कुशोत्पाटिनी या कुशग्रहणी अमावस्या, अघोरा चतुर्दशी या स्थानीय भाषा में डगयाली के नाम से भी मनाया जाता है।

पूर्व रात्रि को करते है गर्भ पूजन

ऐसा माना जाता है कि कृषि कार्य के दौरान यहीं वह समय है जब अन्न माता गर्भ धारण करती है। अर्थात् धान के पौधों में विकास होता है। इसी कारण पोला के दिन किसी को भी खेतों में जाने की अनुमति नहीं होती।

रात में जब गांव के सब लोग सो जाते है। तब गांव का पुजारी या बैग, मुखिया तथा कुछ पुरुष सहयोगियों के साथ अर्धरात्रि को गांव तथा गांव के बाहर सीमा क्षेत्र में प्रतिष्ठित सभी देवी-देवताओं के पास जाकर विशेष पूजा करते है।

ऐसे करते है पूजा पोला में

पोला पर्व में सुबह होते ही गृहिणी घर में छत्तीसगढ़ी व्यंजन जैसे गुडहा चीला, चैसेला, अनरसा, सोहारी, खुरमी, ठेठरी, बरा, भजिया, मूठिया, तसमई बनाती है।

वहीं किसान अपने गौ वंश व बैलों को नहलाते है। उनके सींग व खूर में पेंट या पाॅलिस लगाकर कई प्रकार से सजाते है। गले में घुंघरू, घंटी या कौड़ी से बने आभूषण पहनाते है। उसके बाद विधि-विधान से पूजा करते है।

मिट्टी के बर्तनों की भी पूजा

पोला के लिए खास तौर पर मिट्टी के बर्तन व खिलौने बच्चों के लिए लाए जाते है। पहले इनकी भी पूजा-अर्चना की जाती है। इन्हीं मिट्टी के बर्तनों में पोला पर्व का भोग अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि मिट्टी सबसे पवित्र होता है।

कृषि कार्य के कारण इसी में भोग लगाते है। साथ ही घर के बच्चियां इन बर्तनों के माध्यम से घर-गृहस्थी को अच्छे से सम्हालना सीखे। पूजा के बाद बच्चे इन खिलौने से खेलते है।

नंदी सजाए जाएंगे

बैलों को नंदी का ही स्वरूप माना जाता है। कृषि कार्य में पूरा सहयोग करने के कारण यह पूजे भी जाते है। पोला के दिन नंदी स्वरूप बैलों को सजाकर गांव व शहर में किसान घूमाते है। माना जाता है कि इस दिन नंदी की पूजा करने से भगवान शंकर की भी कृपा मिलती है।












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