छत्तीसगढ़ में भगवान विष्णु के अवतारों ने रखे कदम, कृष्ण ने राजा मोरध्वज की ली थी परीक्षा, पढ़े लेख

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प्रदेश का इतिहास गौरवशाली रहा है। यहां पर सिर्फ श्री राम ही नहीं बल्कि श्रीकृष्ण ने भी अपने चरण रखे थे। जिसके कारण से प्रदेश में मंदिरों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध आरंग को जाना जाता है।

यहां पर भगवान राम ने तो बागेश्वरनाथ महादेव की पूजा की थी। वहीं श्री कृष्ण भी अपने परमभक्त की परीक्षा लेने पहुंचे थे। इस लेख के माध्यम से हम विस्तार से भगवान श्रीकृष्ण के भक्त मोरध्वज के विषय में बताएंगे।

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक ये वह स्थान है। जहां श्रीकृष्ण ने मोरध्वज की कड़ी परीक्षा ली थी। यह जगह है आरंग। जो रायपुर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस जगह को लेकर प्राचीन मान्यताएं है। साथ ही यहां के रहवासियों के जुबान पर यह कथाएं है।

यहां रहते थे राजा मोरध्वज

इस क्षेत्र को लेकर प्रचलित कथा हैं कि यह जगह प्राचीन समय में राजा मोरध्वज की राजधानी थी। जिसकी पहचान एक समृद्ध नगर के रूप में होती थी। धार्मिक पुराणों में इससे जुड़ी कथाओं के अनुसार श्रीकृष्ण ने मोरध्वज को आदेश दिया था वह अपने बेटे ताम्रध्वज को आरी से चीरकर उसका मांस शेर के सामने पेश करे। इसी वजह से इस जगह का नाम आरंग पड़ा।

अर्जुन को दिखाने श्रीकृष्ण ने ली राजा मोरध्वज की परीक्षा

पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद कृष्ण अपने भक्त मोरध्वज की परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने अर्जुन से शर्त लगाई थी कि उनका अर्जुन से भी बड़ा कोई भक्त है। कृष्ण ऋषि के वेश बनाकर अर्जुन को साथ लेकर मोरध्वज के पास पहुंचे। उससे कहा मेरा शेर भूखा है।

वह मनुष्य का ही मांस खता है। राजा अपना मांस देने को तैयार हो गए। तो कृष्ण ने दूसरी शर्त रखी की किसी बच्चे का मांस चाहिए। राजा ने तुरंत अपने बेटे का मांस देने की पेशकश की। कृष्ण ने कहा आप दोनों पति-पत्नी अपने पुत्र का सिर काटकर मांस खिलाओ।

मगर इस बीच आपकी आंखों से आंसू नहीं दिखना चाहिए। राजा ने बेटे का बाया भाग आरी काटा तब बेटे के दाए आंख से आंसू आ गया। तो कृष्ण जी ने मांस लेने से इनकार किया। कहा कि आंख से आंसू आ गए। तो राजा के बेटे ने कहा कि मेरे आंख से आंसू दर्द के कारण नहीं बल्कि इस लिए आए है

कि आखिर दाए भाग की क्या गलती है। जो सिर्फ बाया भाग आपने मांगा। यह बात जब श्रीकृष्ण ने सुनी तो भगवान प्रसन्न हो गए। फिर उन्होंने अपने परम भक्त के पुत्र को जीवित कर दिया। अर्जुन ने भी इस परम भक्त को देखकर हार मान ली।

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