अपनी गुरु से प्रभावित होकर रश्नि ने शुरू किया पंडवानी लोक गायन करना, अब लोक कला को प्रचारित कर रही लोगों के बीच

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Impressed by his mentor, he started to dance Pandwani from Rashni, now among the people promoting folk art

महिला दिवस विशेष

जीवन में हर कोई किसी न किसी प्रभावित होता ही है और अपने जीवन को सही दिशा प्रदान करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करता रहता है। लोक कला के क्षेत्र में बहुत से लोक कलाकार है जो छत्तीसगढ़ी लोक कला को प्रचारित व प्रसारित करने का कार्य कर रहे है। उन्हीं में से एक है पंडवानी कलाकार रश्नि वर्मा।

जो स्कूल में पंडवानी लोक गायन का प्रशिक्षण पद्मविभूषण तिजन बाई से प्राप्त करते हुए उनसे काफी प्रभावित हुई और कला को ही अपना जीवन मानकर इस क्षेत्र में आगे बढ़ती रही। लोक कलाकारों के बीच रश्नि वर्मा उभरती हुई पंडवानी कलाकार के तौर पर जानी जाती है और लोक कला को प्रचारित करते हुए लोगों के बीच एक उदाहरण बन गई है।

रश्नि वर्मा बिलासपुर की रहने वाली है। पद्मविभूषण पंडवानी कलाकार तिजन बाई से रश्नि बहुत ज्यादा प्रभावित है। रश्नि ने बताया कि जब वह कक्षा नौवीं में थी तब आकार प्रशिक्षण शिविर में पद्मविभूषण तिजन बाई से पंडवानी का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ था। उनसे मिलकर रश्नि ने लोक गायन तो सीखा ही साथ ही साथ वह पंडवानी कला को आगे बढ़ाने के लिए भी प्रेरित हुई।

माता-पिता सभी कलाकार

रश्नि के परिवार में सिर्फ रश्नि ही नहीं बल्कि उसके घर में सभी कलाकार है। पिता लखनलाल वर्मा भजन गाते है, मां बूंद कुंवर भी भजन व जसगान करती है। वहीं बहन गायत्री वर्मा भी गायन करती है। इसलिए गायन का शौक पहले से ही था। परिवार में ऐसा माहौल मिला की रश्नि गायन के क्षेत्र में आगे बढ़ती गई। शुरुआत जस गान व भजन गान से किया।

संगीत की शिक्षा हासिल की

क्लासिकल वोकल संगीत में ममता चक्रवर्ती व विपलव चक्रवर्ती के मार्ग दर्शन में डिप्लोमा किया। फिर रेलवे स्कूल, नवोदय विद्यालय रायगढ़ व मल्हार में संगीत शिक्षक के तौर पर अपनी सेवाएं देकर कला को प्रचारित कर रही है।

सात दिन का प्रशिक्षण रहा महत्वपूर्ण

रश्नि ने बताया कि जब पद्मविभूषण तिजन बाई कला गुरु के रूप में महारानी लक्ष्मी बाई स्कूल में 2006 में पंडवानी लोक गायन का प्रशिक्षण दे रही थी तब सात दिन तक पंडवानी लोक गायन की बारिकियां उन्होंने बताई थी। रश्नि सात दिन के प्रशिक्षण के बाद से ही इस क्षेत्र से जुड़ी। सात दिनों में जो प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वह ही उसे आगे लेकर चली।

स्कूल से शुरु हुआ सफर

रश्नि का सफर स्कूल से ही शुरु हुआ। जब आकार शिविर में पंडवानी का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही थी तब ही पद्मविभूषण तिजन बाई ने रश्नि के हाव-भाव व गायन को काफी पसंद किया और उसको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। फिर रश्नि धीरे-धीरे स्टेज में प्रस्तुति देने लगी।

गुरु ने भी की सराहना

रश्नि ने पंडवानी की प्रस्तुति स्कूल में कई बार दी। फिर धीरे-धीरे बड़े मंच पर भी पहुंची। रश्नि के प्रस्तुति को देखकर गुरु पद्मविभूषण तिजन बाई ने रश्नि को अपनी बेटी माना और उसे इस क्षेत्र में लगातार प्रशिक्षण के साथ मार्गदर्शन भी प्रदान कर रही है। जिसमें सबसे बड़ी उपलब्धि रही चक्रधर समारोह 2018 में पंडवानी की प्रस्तुति देना था।

जहां पर रश्नि को पंडवानी का भविष्य के तौर पर देखा जाने लगा। इसके बाद डाॅ.सीवी रामन विश्वविद्यालय में रामन कला महोत्सव 2020 में प्रस्तुति देना। गुरुघासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय के नेश्नल काॅन्फ्रेंस में प्रस्तुति देना था। अब लगातार रश्नि बड़े मंच पर पंडवानी नृत्य की प्रस्तुति देती है।

लोक कला को प्रचारित भी कर रही

रश्नि ने बताया कि लोक कला को बचाना बहुत जरूरी है। इसलिए सिर्फ पंडवानी ही नहीं बल्कि भरथरी, नाचा, ददरिया जैसे लोकनृत्य व लोक गायन को बचाना है। वह इसके लिए ग्रामीण अंचल व शहरी क्षेत्र में लगातार लोगों के बीच पहुंचकर इसके महत्व को बताती है। साथ ही कुछ बच्चों को प्रशिक्षित भी करती है।

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