पितरों को पापों से दिलाना है मुक्ति तो करे इंदिरा एकादशी का व्रत, जाने महत्व

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If fathers have to be freed from sins, then Indira Ekadashi fasting should be understood
पितरों को पापों से दिलाना है मुक्ति तो करे इंदिरा एकादशी का व्रत, जाने महत्व

साल भर में 24 एकादशी की तिथि होती है। लेकिन जब मलमास या पुरुषोत्तम मास होता है। तब इसकी संख्या 26 हो जाती है।

एकादशी का व्रत भगवान श्रीहरि विष्णु को बहुत पसंद है।

इस बार 13 सितंबर को यह एकादशी व्रत होगी। इस दिन व्रत करने वाले भक्तों से भी जल्दी ही प्रसन्न हो जाते है।

प्रत्येक एकादशी का विशेष महत्व माना गया है।

भाद्र पद शुक्ल पक्ष की एकादशी को इंदिरा एकादशी कहते है। इस व्रत के महत्व को लेख के माध्यम से बताएंगे।

मान्यता है पितर पक्ष में पड़ने वाले इस इंदिरा एकादशी का व्रत करने से पितरों की आत्मा पापों से मुक्त होती है।

पितर पक्ष में पड़ने के कारण इस एकादशी का महत्व बढ़ जाता है। इस व्रत को करने से पितरों को पापों से मुक्ति मिलती है।

इंदिरा एकादशी का महत्व

पितृ पक्ष में पड़ने के कारण इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इंदिरा एकादशी के दिन व्रत करने से न केवल पितरों का उद्धार होता है।

बल्कि नर्क भोग रहे पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यही नहीं इंदिरा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को सभी तरह के पापों से मुक्ति मिलती है।

साथ ही एकादशी के दिन विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होकर सभी तरह के मनोकामनाएं पूरी करते है।

इस दिन कैसे करे पूजा

इंदिरा एकादशी का हिन्दू धर्म में खास महत्व है। इस एकादशी के दिन विधिवत पूजा-अर्चना से न केवल व्रती को पापों से मुक्ति मिलती है।

बल्कि विष्णु भगवान की विशेष कृपा मिलती है। इस दिन सबसे पहले सुबह उठकर भगवान का ध्यान कर व्रत करने का संकल्प करे।

इसके बाद स्नान कर साफ कपड़े पहने। स्नान तथा स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा प्रारंभ करे। फिर शालिग्राम भगवान को पंचामृत से नहलाए।

शालिग्राम भगवान के समक्ष पूर्वजो का विधिवत श्राद्ध करे। अब पूजा करें पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान ऋषि केश की पूजा करे।

एकादशी के दिन ब्राम्हण को फलाहार खिलाएं और दक्षिणा दे। एकादशी के दिन मन-वचन से व्रत रहे। द्वादशी के दिन स्नान कर पूजा करे। ब्राम्हणों को दान दे।

व्रत की पौराणिक कथा

कथा के मुताबिक प्राचीन काल में महिष्मति नगर में इंद्रसेन नाम का राजा शासन करता था। वह राजा विष्णु का परम भक्त था।

एक दिन जब राजा अपनी सभा में बैठा था तो महर्षि नारद उसकी सभा में आए। मुनि ने राजा से कहा आपके सभी अंग कुशल तो है न।

आप विष्णु की भक्ति को करते है न। यह सब सुनकर राजा ने कहा सब ठीक है। मैं यमलोक में तुम्हारे पिता को यमराज के निकट सोते देखा।

उन्होंने संदेश दिया है कि मेरे पुत्र करे एकादशी का व्रत करने को कहना। यह सुनकर राजा व्यग्र हो गए । नारद से बोले कि आप मुझे व्रत की विधि बताए।

नारद ने कहा दशमी के दिन नदी में स्नान कर पितरों का श्राद्ध करे। एकादशी को फलाहार कर भगवान की पूजा करे।

साथ ही नारदजी कहने लगे अगर आप इस विधि से बिना आलस के एकादशी का व्रत करेंगे। आपके पिता जरूर स्वर्ग जाएंगे। इतना कहकर नारद जी चले गए।

नारदजी की कथा के अनुसार राजा ने अपने भाईयों दासों के साथ व्रत करने से आकाश से फूलों की बारिश हुई।

उस राजा के पिता गरूड़ पर चढ़कर विष्णु लोक पर चले गए। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के असर से अंत में अपने पुत्र को राज्य देकर स्वर्ग को चले गए।

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