कैसे बनता है अधिक मास, जाने इस लेख में

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हम अक्सर ही अधिक मास अथवा पुरुषोत्तम मास के विषय में सुनते है। लेकिन यह क्या है और इस मास का क्या महत्व है। इस विषय में कम ही जानते है। इस लेख के माध्यम से हम अधिक मास के विषय में विस्तार से बताएंगे। अधिकमास में क्या करना चाहिए और क्या नहीं इसकी भी जानकारी देंगे।

हिन्दू कैलेण्डर में हर तीन साल में एक बार अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है। जिसे अधिकमास अथवा मलमास के नाम से जानते है। इसे ही पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत के हिन्दू परायण लोग इस माह के महत्व को समझते है। ज्योतिषाचार्य पंडित महेश्वर प्रसाद उपाध्याय ने बताया कि इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवतभक्ति, व्रत उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों को करना उत्तम होता है।

मान्यता है कि इस अधिकमास की अवधि में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है। इसी वजह से श्रद्धालु जन अपनी पूरी श्रद्धा से इस माह में भगवान को प्रसन्न कर अपना इहलोक तथा परलोक सुधारने में जुट जाते है।

हर तीन साल में आता है अधिकमास
अधिकमास वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार भारतीय हिन्दू कैलेण्डर सूर्य मास और चंद्र मास की गणना के अनुसार चलता है। अधिकमास चंद्र वर्ष का एक अतिरिक्त भाग है। जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घंटे के अंतर से आता है।

इसका प्राकट्य सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच अंतर का संतुलन बनाने के लिए होता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है। वहीं चंद्र वर्ष में 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षो के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है। जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 माह के बराबर होता है। इसी अंतर को पाटने के लिए या संतुलन बनाने के लिए तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है। जिसे अतिरिक्त होने के कारण ही अधिकमास नाम दिया गया है।

इसलिए कहते है मलमास
हिन्दू धर्म में अधिकमास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए है। माना जाता है कि अतिरिक्त होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिन्दू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृह प्रवेश, नई बहु मूल्य वस्तुओं की खरीदी नहीं की जाती है। मनि मानने के कारण ही इस मास का नाम मल मास पड़ गया है।

कहते है पुरुषोत्तम मास
अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते है। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसलिए अधिकमास को पुरुषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। इस विषय में एक बड़ी ही रोचक कथा पुराणों में उल्लेखित है। कहा जाता है कि भारतीय मनीषियों ने अपनी गणना पद्धति से हर चंद्र मास के लिए एक देवता निर्धारित किए। चूंकि अधिकमास सूर्य और चंद्र मास के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रकट हुआ। तो इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई देवता तैयार नहीं हुआ। ऐसे में ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने उपर ले। भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह से यह मल मास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया।

यह भी है इसकी पौराणिक कथा
अधिक मास के लिए पुराणों में बड़ी ही सुंदर कथा सुनने को मिलती है। यह कथा दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध से जुड़ी है। पुराणों के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने एक बार ब्रम्हा जी को अपने कठोर तप से प्रसन्न कर लिया और उनसे अमरता का वरदान मांगा। चूंकि अमरता का वरदान देना निषिद्ध है। इसलिए ब्रम्हाजी ने उसे कोई भी अन्य वर मांगने को कहा। तब हिरण्यकश्यप ने वर मांगा कि उसे संसार का कोई नर, नारी, पशु, देवता या असुर मार ना सके। वह वर्ष के 12 महीनों में मृत्यु को प्राप्त ना हो। जब वह मरे तो ना दिन का समय हो ना रात का। वह ना किसी अस्त्र से मरे, ना किसी शस्त्र से। उसे ना घर में मारा जा सके, ना ही घर से बाहर मारा जा सके। इस वरदान के मिलते ही हिरण्यकश्यप स्वयं को अमर मानने लगा और उसने खुद को भगवान घोषित कर दिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अधिक मास में नरसिंह अवतार यानि आधा पुरुष और आधे शेर के रूप में प्रकट होकर शाम के समय देहरी के नीचे अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप् का सीना चीर कर उसे मृत्यु के द्वार भे दिया।

अधिक मास में क्या करे
आमतौर पर अधिक मास में हिन्दू श्रद्धालु व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, ध्यान, भजन, कीर्तन, मनन को अपनी जीवनचर्या बनाते है। पौराणिक सिद्धांतों के अनुसार इस मास के दौरान यज्ञ-हवन के अलावा श्रीमद् देवीभागवत, श्री भागवत पुराण, श्री विष्णु पुराण, भविष्योत्तर पुराण आदि का श्रवण, पठन, मनन विशेष रूप से फलदायी होता है। अधिकमास के अधिष्ठाता भगवान विष्णु है। इसलिए इस पूरे समय में विष्णु मंत्रों का जाप विशेष लाभकारी होता है। ऐसा माना जाता है कि अधिक मास में विष्णु मंत्र का जाप करने वाले साधकों को भगवान विष्णु स्वयं आशीर्वाद देते है उनके पापों का शमन करते है और उनकी समस्त इच्छाएं पूरी करते है।








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