उल्लू कैसे बना मां लक्ष्मी का वाहन, पढ़े पौराणिक कथा

मां लक्ष्मी को सुख-समृद्धि व धन-वैभव की देवी कहा जाता है। मां लक्ष्मी की कृपा जिस भी व्यक्ति पर होती है वह रातों रात आर्थिक रूप से शक्तिशली बन जाता है। धन-सम्पत्ति व वैभव की प्राप्ति के बिना मनुश्य के जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

लक्ष्मी के भक्त उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करते है। मां लक्ष्मी को कमल का पुष्प पसंद है। उनकी पूजा कैसे करे यह तो सभी जानते है। इस लेख के माध्यम से हम उनके वाहन उल्लू के

विषय में जानेंगे और आखिर उल्लू मां लक्ष्मी का वाहन कैसे बना इसकी कथा जानेंगे। मान्यता है कि किसी व्यक्ति को मूर्ख बनाना को उल्लू बनाना कहा जाता है।

जिसका मतलब की मूर्ख व्यक्ति को उल्लू समझा जाता है, लेकिन यह धारणा गलत है। उल्लू सबसे बुद्धिमान निषाचारी प्राणी होता है। उल्लू को भूत और भविश्य का ज्ञान पहले से ही हो जाता है।

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मां लक्ष्मी का ऐसे बना वाहन उल्लू

पुराणों में पौराणिक कथा है। प्राणी जगत की संरचना करने के बाद एक रोज सभी देवी-देवता धरती पर विचरण के लिए आए। जब पशु-पक्षियों ने उन्हे पृथ्वी पर घूमते हुए देखा तो उन्हें अच्छा नहीं लगा और वह सभी

एकत्रित होकर उनके पास गए और बोले आपके द्वारा उत्पन्न होने पर हम धन्य हुए है। हम आपको धरती पर जहां चाहेंगे वहां ले चलेंगे। कृपया आप हमें वाहन के रूप् में चुने और हमें कृतार्थ करे।


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देवी-देवताओं ने उनकी बात मानकर उन्हें अपने वाहन के रूप् में चुनना आरंभ कर दिया। जब लक्ष्मीजी की बारी आई तब वह असमंजस में पड़ गई किस पशु-पक्षी को अपना वाहन चुने। इस बीच पशु-पक्षियों में भी होड़ लग गई कि वह लक्ष्मीजी के वाहन बने। इधर लक्ष्मीजी सोच-विचार कर ही रही थी तब तक पशु-पक्षियों में लड़ाई होने लगी।


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लक्ष्मीजी ने उन्हें चुप कराया और कहा कि प्रत्येक वर्श कार्तिक अमावस्या के दिन मै। पृथ्वी पर विचरण करने आती हूं। उस दिन मैं आपमें से किसी एक को अपना वाहन बनाउंगी।

कार्तिक अमावस्या के रोज सभी पशु-पक्षी आंखें बिछाए लक्ष्मीजी की राह निहारने लगे। रात्रि के समय जैसे ही लक्ष्मीजी धरती पर पधारी उल्लू ने अंधेरे में अपनी तेज नजरों से उन्हें देखा और तीव्र गति से उनके समीप पहुंच गया

और उनसे प्रार्थना करने लगा कि आप मुझे अपना वाहन स्वीकारे। लक्ष्मीजी ने चारों ओर देखा उन्हें कोई भी पशु या पक्षी वहां नजर नहीं आया। तो उन्होंने उल्लू को अपना वाहन स्वीकार कर लिया। तभी से उन्हें उलूक वाहिनी कहा जाता है।

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