कलयुग में गीता के श्लोक जीवन में कैसे है लाभकारी, जाने यहां प्रथम श्लोक का महत्व

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वर्तमान युग कलयुग है ऐसे में जीवन के महत्व को समझने के लिए गीता का श्लोक यथार्थ से अवगत कराते है। इस लेख के माध्यम से हम सांसारिक जीवन में गीता के श्लोक के अर्थ, महत्व को बताएंगे। इस लेख में गीता के प्रथक श्लोक का अर्थ अभिषेक मिश्रा के मुताबिक बताए गए है।

गीता का प्रथम श्लोक

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्र समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पांडवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।

इस श्लोक में धृतराष्ट्र संजय से पूछते है कि धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में मेरे और मेरे भाई पांडु के पुत्र क्या कर रहे है। यहां पर धर्म क्षेत्र और कुरुक्षेत्र से तात्पर्य सांसारिक जीवन से है।

हर व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन में अपने निर्णय के आधार पर जाना जाता है। जब निर्णय लेने का समय होता है उस वक्त व्यक्ति को सही या गलत का बोध नहीं होता है।

निर्णय के परिणाम भी उसे पता नहीं होते है, और इस जानकारी के बिना ही निर्णय लेना पड़ता है। निर्णय लेने के समय व्यक्ति के पास दो विकल्प होते है।

पहला विकल्प होता है वह निर्णय जो व्यक्ति के हित में होता है और दूसरा विकल्प वह निर्णय होता है जो समाज के हित में होता है। समाज के हित में लिया गया निर्णय ही धर्म कहलाता है।

जब परिणाम प्राप्त होने का समय आता है तब व्यक्ति के मन में उत्सुकता होती है कि उसके द्वारा लिया गया निर्णय धर्मानुसार है या नहीं, और व्यक्ति यह चाहता है कि उसके द्वारा लिया गया निर्णय सही साबित हो।

इसी बात का ध्यान रखते हुए धृतराष्ट्र के मन में यह उतावलापन होता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध का परिणाम उसके अनुरूप होगा या नहीं होगा।

जीवन के लिए इस श्लोक की सीख

हम जो भी निर्णय लेते है चाहे वह अच्छा हो या बुरा हो, उसका परिणाम हमें अपने वर्तमान या भविष्य में भोगना ही पड़ता है।

कुछ क्षणों के लिए हम अपने गलत निर्णय के द्वारा सुख प्राप्त कर सकते है परंतु गलत निर्णय से अंतिम क्षणों में हमारा मन बेचैन जरूर होता है।

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