भगवान गणेश के कितने है अतवार, जाने यहां

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मां गौरी के लाडले श्री गणेश को हर कोई प्रथम पूज्य के तौर पर जानता है। लेकिन क्या आपको पता है भगवान गणेश ने भी श्री हरि विष्णु व महादेव की तरह ही अवतार लेकर देवी-देवताओं को कई संकटों से मुक्त किया है। इस लेख के माध्यम से आज हम आपको भगवान गणेश के सभी अवतारों के विषय में विस्तार से बताएंगे।
भगवान गणेश को यू ही विघ्नहर्ता नहीं कहा जाता है। उन्होंने चाहे देवी-देवताओं के लिए हो या मनुष्यों के लिए हर संकट की घड़ी में विघ्नों से मुक्त किया है। हिन्दू सनातन धर्म में महादेव विष्णु और गणेश जी ऐसे देवता है जो अवतार धारण करके दानवों का संहार करके रक्षा करते है। गणेश पुराण के अनुसार भगवान गणेश ने 8 अवतार लिए थे।

ये है गणेश के 8 अवतार

भगवान गणेश के 8 अवतार बताए गए है। जिसमें से सबसे पहला वक्रतुंड, दूसरा एक दंत, तीसरा महोदर, चैथा गजानन, पांचवा लंबोदर, छठवां विकट, सातवां विघ्नराज और आठवां धूम्रवर्ण। इस तरह से भगवान गणेश ने अवतार लिए और मनुश्यों, देवी-देवताओं के विघ्न को दूर किया।

सभी अवतार को विस्तार से पढ़े

वक्रतुंड

भगवान श्री गणेश का यह पहला अवतार था। वक्रतुंड अवतार उन्होंने मत्सरासुर नामक दैत्य और उसके दो असुर पुत्रों को मारने के लिए लिया था। मत्सरासुर ने भगवान शिव की घोर तपस्या की और महाशक्तियों की प्राप्ति की। उसने फिर जगत में अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसका इसमें साथ उसके दो पुत्र भी दे रहे थे। देवी-देवताओं ने शिव से अपनी व्यथा बताई तब शिव ने गणेश के अवतार लेने की बात बताई। देवी-देवताओं के आहवान पर गणेशजी ने वक्रतुंड धारण किया और मत्सरासुर और उसे पुत्रों का वध करके विघ्नों का नाश कर दिया।

एकदंत

गणेश जी का दूसरा अवतार एकदंत था। एक बार दानवों ने मद नामक एक शक्तिशाली दानव हुआ। जिसने गुरू शुक्राचार्य से शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। इसने सभी देवी-देवताओं को युद्ध में परास्त कर दिया। देवी-देवताओं के कष्ट मिटाने के लिए और इस असुर मदासुर के संहार के लए गणेश जी ने एकदंत अवतार लिया।

महोदर

मोहासुर असुर का वध करने के लिए गणेश जी ने तीसरा अवतार महोदर का लिया। इस अवतार में उनका पेट बहुत बड़ा था। बिना युद्ध के ही मोहासुर ने गणेश के सामने खुद को समर्पण कर दिया।

गजानन

एक बार कुबेर कैलाश पर्वत पर आते है और मां पार्वती पर मोहित हो जाते है। उनके काम से लोभासुर का जन्म होता है। लोभासुर को दैत्य गुरु दीक्षा, शिक्षा देते है और उन्हीं के आदेश पर लोभासुर शिवजी की घोर तपस्या करते है और निर्भय होने का वरदान पाता है। संकट की फिर इस घड़ी में देवता गणेश का स्मरण करते है और भगवान गणेश गजानन अवतार लेते है।

लंबोदर

समुद्र मंथन के समय मोहिनी रूप देखकर भगवान शिव मोहित हो जाते है और उनके काम से एक दैत्य क्रोधासुर उत्पन्न होता है। क्रोधासुर सूर्य की घोर तपस्या करके शक्ति प्राप्त करता है और त्रिलोक में उसके नाम का डंका बजने लगता है। देवता विघ्न हरण गणेश की स्तुति करते है और लंबोदर अवतार लेके श्री गणेश की स्तुति करते है और लंबोदर अवतार लेके श्री गणेश क्रोधासुर का संहार करते है।

विकट

जलंधर के संहार के लिए जब भगवान विष्णु ने उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तब उसने एक मिलन से कामासुर नामक दैत्य की उत्पत्ति हुई। जिसने त्रिलोक पर विजय प्राप्त करके अधर्म को बढ़ाने लगा। देवताओं ने इस संकट के समय में श्री गणेश की आराधना शुरू की तब श्री गणेश ने विकट रूप में अवतार लेके कामासुर से त्रिलोक को मुक्त कराया। इस अवतार में गणेश का वाहन चूहा न होकर एक मोर था।

विघ्नराज

यह गणेश जी का सातवां अवतार है जो ममासुर दैत्य के वध के लिए गणेश ने लिया था।

धूम्रवर्ण

एक बार भगवान सूर्य देव को कर्म राज्य की प्राप्ति पर घमंड हो गय। सूर्य देव को उस समय एक छिंक आ गई और उस छिंक से एक दैत्य का जन्म हुआ जिसका नाम अहम था। गुरु शुक्राचार्य की शिक्षा प्राप्त करके वो अहंता सुर हो गया। उसने श्री गणेश की घोर तपस्या की और महाशक्तिशाली बन गया। उसके अत्याचार बढ़ने लगे तब श्री गणेश ने धूम्रवर्ण अवतार लिया और अहंतासुर को सबक सिखाया। धूम्रवर्ण अवतार में उसका रंग धुंए के समान था और शरीर से ज्वालाएं फुट रही थी।

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