कुबेर के धन-वैभव के घमंड को कैसे तोड़ा श्री गणेश ने, पढ़े पूरी कथा

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कुबेर को हर कोई धन का देवता मानता है लेकिन कुबेर देवता नहीं गंधर्व है। धन-धान्य का भंडार उनके पास है साथ ही स्वर्ण का अक्षत भंडार उनके पास ही माना जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि कुबेर को जब घमंड हुआ तो उसने सभी देवताओं को बारी-बारी से अपने घर बुलाकर अपना वैभव दिखाना चाहा था। तब गौरी नंदन श्री गणेश भी वहां पहुंचते थे और श्री गणेश ने उनके अहंकार को तोड़ा था। इस लेख के माध्यम से हम इस बात की जानकारी देंगे।
जब भी धन-दौलत हो या फिर शिक्षा-संस्कार व्यक्ति को उस पर कभी भी अभिमान नहीं करना चाहिए। सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि देवताओं में भी अहंकार व अभिमान का भाव आ जाता है। जिसकी कथा हम ने पुराणों में सुनी है। आज हम उन्हीं में से एक कथा कुबेर को लेकर सुनाएंगे।

कुबेर ने दिया भोलेनाथ को न्योता

एक बार कुबेर को अपने धन-वैभव पर बहुत अभिमान हो गया था वह सभी को अपने घर बुलाकर उसका अभिमन करता था। एक बार उसने सोंचा कि मेरे पास इतनी समृद्धि है तो क्यों न मैं शंकर जी को अपने घर पर भोजन का न्योता दू और उन्हें अपना वैभव दिखाउं। यह विचार लेकर कुबेर कैलाश पर्वत गए और वहां शंकरजी को भोजन पर पधारने का नयोता दिया। शंकरजी को कुबेर के आने का उद्देश्य समझ आ गया था। वे समझ गए थे कि कुबेर भोजन के बहाने अपना वैभव दिखाना चाहता है।

पुत्र गणेश को भेजा भोजन पर

जब कुबेर ने न्योता दिया तो भगवान शंकर ने कहा कि हम तो नहीं आ पाएंगे। आप इतने आदर से न्योता देने आए है तो हम गणेश को भेज देंगे। शंकरजी और माता पार्वती ने गणेश जी से कुबेर के साथ जाने को कहा। गणेशजी सहज ही राजी हो गए। गणेश जी को ज्ञात हो गया था कि कुबेर उन्हें भोजन पर क्यों बुलाने आया है और गणेश जी उनका अभिमान तोड़ने की युक्ति में जुट गए। वे अपना मूषक भी साथ लेकर गए। कुबेर के महल में गणेश जी और उनके मूशक को भोजन परोसना शुरू किया गया। दिखावे के लिए सोने-चांदी के पात्रों में अति स्वादिष्ट पकवान परोसे गए।

खत्म हो गया खाद्य का भंडार

गणेश जी ने जब स्वादिष्ट व्यंजनों को खाना शुरू किया तब कुछ ही समय में सारे पकवान समाप्त हो गए। गणेश की भूख शांत होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अब उन्होंने बर्तन खाने शुरू कर दिए। हीरे-मोती, जवाहरात सब खाने के बाद भी गणेश की भूख शांत नहीं हुई। कुबेर परेशान हो गए लेकिन उन्हें अपनी भूल का अहसास हो गया था। घबराकर वे शंकर जी के पास आए और हाथ जोड़कर माफी मांगते हुए बोले कि मैं अपने कर्म से शर्मिंदा हूं और मैं समझ गया हूं कि मेरा अभिमान आपके आगे कुछ नहीं। तब कहीं जाकर गणेशजी लौटे लेकिन धन के देवता को सबक सिखाने में कामयाब रहे।

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