यहां पर बाबा बटेश्वर नाथ के नाम से जाने जाते है महादेव, प्राचीन है मंदिर, पढ़े पूरा इतिहास

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भगवान शिव की महिमा अपार है। उनकी पूजा-अर्चना भक्त अलग-अलग रूप में करते है। इस लेख के माध्यम से हम प्रसिद्ध बाबा बटेश्वर नाथ के नाम से विराजमान है। इस मंदिर का इतिहास आज का नहीं बल्कि बहुत प्राचीन है। मंदिर में सिर्फ सावन नहीं बल्कि साल भर विधि-विधान से महादेव की पूजा करने के लिए श्रद्धालु पहुंचते है।
बिहार राज्य भागलपुर जिला के अंतर्गत कहलगांव अवस्थित ओरियअव पंचायत के उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर अवस्थित बाबा बटेश्वर नाथ की महिमा बहुत निराली है। यहां पर भक्त जो भी मनोकामना लेकर आते हैं। वह मनोकामना पूर्ण होती है। मंदिर जिस क्षेत्र में है वहां पर कई तीर्थ स्थल है।

दुवार्सा ऋषि का भी है आश्रम

इस क्षेत्र में अनेक धार्मिक स्थल तो है ही साथ ही इस क्षेत्र में कई ऋषियों के आश्रम भी है। जिसमें से दुवार्सा ऋषि के विषय में तो सभी जानते है। उनके क्रोध से कोई बच नहीं सका है। वहीं उन्हे कई लोगों ने प्रसन्न कर आशीर्वाद भी प्राप्त किया है। पाण्डु की पत्नी कुंती ने अपने पुत्रों को उन्हीं के वरदान से ही प्राप्त किया था। काशरी गांव के पास दुर्वासा ऋषि का आश्रम छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय भी है

इस मंदिर के क्षेत्र में विक्रमशिला विश्वविद्यालय भी है जो बहुत ही प्राचीन है। यह विश्वविद्यालय यहां से पूरब दिशा की ओर करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

कैसे पहुंचे यहां

यह स्थान बिहार राज्य के भागलपुर जिला में कहलगांव रेलवे स्टेशन से करीब 9 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यहां जाने के लिए दोपहिया व चार पहिया वाहन का इस्तेमाल किया जा सकता है। वहीं आॅटो व अन्य साधन से भी यहां पहुंचा जा सकता है।

यह है पौराणिक कथा

काशरी गांव में रहने वाले वरिष्ठ नागरिक व स्थानीय निवासी अशोक कुमार मिश्रा ने बताया कि त्रेता काल में वशिष्ठ मुनि यहां पर अपनी कुटिया बनाकर तपस्या क्या करते थे इस स्थान का प्राचीन नाम वशिष्ठ द्वार था बाद के समय में इसका नामकरण बटेश्वर हुआ पहाड़ी पर अवस्थित शिवलिंग तथा सामने में मां काली का मंदिर है जो तांत्रिक सिद्ध पीठ को बतलाता है राजा धर्मपाल ने प्राचीन मंदिर का निर्माण कराया था शिवलिंग की महिमा प्राचीन काल में यह था कि शिवलिंग का जल जिस स्थान पर गिरता था वहीं पर चाबी के आकार का एक कील था जिसे हटाने पर ब्रह्मा विष्णु महेश की मूर्ति प्रकट होती थी। पुनः हटाने पर पार्वती, गणेश, कार्तिक, लक्ष्मी, सरस्वती के मूर्ति का दर्शन होता था जिसे कालांतर में अंग्रेजों ने लेकर चला गया ऐसे तो यहां तपस्वी साधु-संतों का प्राचीन और वर्तमान समय में जमावड़ा लगा रहता है प्राचीन काल में एक तपस्वी संत नागा बाबा हुए जो गंगा के बीचों बीच धारा में अपनी तपस्या किया करते थे बाढ़ के समय में उन्हें किसी तरह का भय नहीं होता था।


एक बार की घटना है की बटेश्वर स्थान में यज्ञ हो रहा था आहुति के लिए जब घी कम पड़ गई तो लोग यज्ञ स्थल से घी के लिए नागा बाबा के पास गए बाबा ने कहा जाओ गंगा मां से जितना लेना है ले लो पुनः लौटा देना गंगा का जल भरते ही वह घी के रूप में हो गया पुण यज्ञ की समाप्ति के पश्चात उतना ही ही वापस कर दिया गया बाद में इनके कई शिष्य हुए। जो पीढ़ी दर पीढ़ी वहां आज भी आराधना कर रहे हैं वर्तमान में माघ और भादो पूर्णिमा के दिन यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है जिनमें लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं सावन के पावन महीने में यहां प्रत्येक सोमवार को विशेष रूप से जलाअभिषेक तथा श्रृंगार पूजा का आयोजन अनेक श्रद्धालुओं द्वारा किया जाता है। यहां प्रत्येक पूर्णिमा को गंगा की महा आरती का भव्य आयोजन भी होता है।

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