हरितालिका तीज व्रत 21 को, जाने व्रत की कथा व महत्व

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हरितालिका तीज का व्रत 21 अगस्त को मनाया जाएगा। इस व्रत को अखंड सौभाग्य की कामना के लिए महिलाएं करती है। माता पार्वती के साथ भगवान शंकर की पूजा-अर्चना व्रत करते हुए करती है। निर्जला व्रत करते हुए अपने पति के दीर्घायु की कामना करती है। इस व्रत को तीजा के नाम से भी जाना जाता है। इस लेख के माध्यम से हम व्रत के महत्व, पूजन विधि व कथा को विस्तार से बताएंगे।

माता पार्वती ने की थी पहली बार पूजा

लिंग पुराण के मुताबिक मां पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर काटी और पिफर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही व्यतीत किया।

माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे। इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर आए। मां पर्वती को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत दुखी हुई। जोर-जोर से विलाप करने लगी। फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वह यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही है।

जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते है। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गई और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गई। भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया।

तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए। इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती है। वह अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती है। साथ ही यह पर्व दाम्पत्य जीवन में खुशी बरकरार रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।

व्रत की पूजा विधि

इस दिन विशेष रूप से गौरी-शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठकर नहा धोकर पूरा श्रृंगार करे। दिन भर निर्जला व्रत करे। रात में पूजन के लिए केले व पुष्पों की मंडप बनाकर गौरी-शंकर की प्रतिमा स्थापित कर पूजन करे।

इसके साथ ही माता पार्वती को सुहाग का सारा सामान अर्पित करे। रात में भजन-कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती करे। शिव पार्वती के विवाह की कथा सुने। इस व्रत के व्रती को शयन का निषेध है। इसके लिए उसे रात्रि में भजन-कीर्तन के साथ रात्रि जागरण करना पड़ता है।

प्रातःकाल स्नान करने के बाद श्रद्धा एवं भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र सुहागिन महिला को श्रृंगार सामग्री, खाद्य सामग्री, फल, मिष्ठान व यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए।

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