संतान के दीर्घ आयु के लिए महिलाएं करेंगी हलषष्ठी का व्रत, जाने व्रत व पूजन विधि

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हिन्दू धर्म में कई व्रत व त्योहार के माध्यम से अपनी परिवार की खुशहाली व दीर्घायु की कामना से व्रत व पूजन किया जाता है। कभी पति के दीर्घायु के लिए तो कभी संतान के दीर्घायु व उज्ज्वल भविष्य की कामना से महिलाएं व्रत करती है। हलषष्ठी का व्रत महिलाएं अपने संतान के उज्ज्वल भविष्य की कामना व दीर्घायु के लिए करती है। इस लेख के माध्यम से हम हलषष्ठी व्रत के विषय में बताएंगे।
हलषष्ठी का व्रत 9 अगस्त को मनाया जाएगा। इस व्रत के विषय में ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया है कि इस व्रत को हलषष्ठी या हरछठ भी कहा जाता है। वहीं छत्तीसगढ़ में इस खास तौर पर खमरछठ कहा जाता है। माताएं अपने संतान के दीर्घायु व उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए इस व्रत को करती है। पूजन मध्यानकाल में या गोधूली बेला में की जाती है।

भाद्र मास के कृष्ण पक्ष में होता है पूजन

भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की छठ तिथि को यह व्रत रखा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की मां देवकी ने लोमस ऋषि के कहने पर यह व्रत रखा था। इसके पुण्य से ही श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। व्रतधारी महिलाएं सुबह उठकर महुएं की दातुन करती है। पेड़ों के फल बिना बोए अनाज, भैंस का दूध व दही का सेवन किया जाता है। निर्जला व्रत रखने के उपरांत शाम में पसहर के चावल व पांच तरह की भाजी ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है।

हलषष्ठी व्रत व पूजा की विधि

भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। यह व्रत बलराम के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। बलराम का मुख्य शस्त्र हल है इसलिए इस व्रत को हलषष्ठी कहते है। इस व्रत में हल से जुते हुए अनाज व सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता है। इसलिए महिलाएं इस दिन तालाब में उगे पसहर चावल खाती है। इस व्रत में गाय का दूध व दही इस्तेमाल में नहीं लाया जाता है। इस दिन महिलाएं भैंस का दूध, घी व दही इस्तेमाल करती है। इस दिन बलराम का जन्मदिन होने के कारण हल से जूता फल, अनाज वर्जित माना जाता है। पूजन के लिए तालाब बनाकर झरबेरी, कास और पलास तीनों की एक-एक डालियां एक साथ बांधी होती है। जमीन को लीपकर वहां पर चैक बनाया जाता है। उसके बाद हरछठ को वहीं पर लगा देते है। सबसे पहले कच्चे जनेउ का सूत हरछठ को पहनाते है।

माता देवकी ने की थी पूजा

मान्यता है कि इस माता देवकी ने कंस के द्वारा अपने छह पुत्रों का वध कर देने के बाद ऋषि लोमस से इस विषय में पूछा और व्रत किया था। इस दिन षष्ठी देवी की आराधना करते हुए व्रत रखा था। इस दिन बलदाउ का जन्म हुआ था। जो सुरक्षित रहे। वहीं श्रीकृष्ण का भी जन्म हुआ और उनको भी कंस मार नहीं सका। तब से ही इस व्रत को करते हुए माताएं अपने संतान की रक्षा की कामना से व्रत करती है।

यह है पौराणिक कथा

प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका मन गौ रस बेचने में लगा हुआ था। उसने सोचा यदि प्रसव हो गया तो गौ रस यू ही पड़ा रह जाएगा। यह सोचकर उसने दूध-दही के घड़े सिर पर रखे और बेचने के लिए चल दी। किंतु कुछ दूर पहुंचने पर उसे असहनीय प्रसव पीड़ा हुई। वह एक झरबेरी की ओट में चली गई और वहां एक बच्चे को जन्म दिया। वह बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गांवों में दूध-दही बेचने चली गई। संयोग से उस दिन हलषष्ठी थी। गाय-भैंस के मिश्रित दूध को केवल भैंस का दूध बताकर उसने सीधे-साधे गांवा वालों को बेंच दिया। उधर जिस झरबेरी के नीचे उसने बच्चे को छोड़ा था उसके समीप ही खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक उसके बैल भड़क उठे और हल का फल शरीर में घुसने से वह बालक मर गया।

इस घटना से किसान बहुत दुखी हुआ। फिर भी उसने हिम्मत और धैर्य से काम लिया। उसने झरबेरी के कांटों से ही बच्चे के चिरे हुए पेंट में टांके लगाए और उसे वहीं छोड़कर चला गया। कुछ देर बाद ग्वालिन दूध बेचकर वहां आ पहुंची। बच्चे की ऐसी दशा देखकर उसे समझते देर नहीं लगी कि यह सब उसके पाप की सजा है। वह सोचने लगी कि यदि मैंने झूठ बोलकर गाय का दूध न बेचा होता और गांव की स्त्रियों का धर्म भ्रष्ट न किया होता तो मेरे बच्चे की यह दशा न होती। अतः मुझे लौटकर सब बातें गांव वालों को बताकर प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा निश्चय कर वह उस गांव में पहुंची। जहां उसने दूध-दही बेचा था। वह गली-गली घूमकर अपनी करतूत और उसके फलस्वरूप मिले दंड का बखान करने लगी। तब स्त्रियों ने स्वधर्म रक्षार्थ और उस पर रहम खाकर उसे क्षमा कर दिया और आशीर्वाद दिया। बहुत सी स्त्रियों द्वारा आशीर्वाद लेकर जब वह पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि वहां उसका पुत्र जीवित अवस्था में पड़ा है तभी उसने स्वार्थ के लिए झूठ बोलने को ब्रम्ह हत्या के समान समझा और कभी भी झूठ न बोलने का प्रण कर लिया।

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