श्री दिगंबर जैन पर्वाधिराज पर्यूषण एवं दसलक्षण धर्म का पांचवा दिन

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बिलासपुर श्री दिगंबर जैन पर्वाधिराज पर्यूषण एवं दसलक्षण धर्म के पांचवे दिन धर्म “उत्तम सत्य” के दिन बिलासपुर जैन सभा की सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन समिति के तत्वावधान में सरकंडा स्थित संत भवन में महिलाओं के नैवेद्यम समूह द्वारा नृत्यनाटिका पंचकल्याणक की मनमोहक प्रस्तुति दी गई। इस नृत्यनाटिका के माध्यम से भगवान के “पांच कल्याणक” – गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक का प्रस्तुतिकरण किया गया। जिसमें डॉ श्रुति जैन भगवान की माता बनी एवं शेष महिलाओं ने अष्ट्कुमारी के रूप में भगवान के पांचो कल्याणको को दिखाया। इस कार्यक्रम में सोनम, भुवि, सपना, शेफाली, रागिनी, प्रिया, रीतिका, स्वाति, सुरभि एवं पूनम ने अष्ट्कुमारी की भूमिका निभाई।

भगवान के तप कल्याणक में बच्चों ने तृयंच जीव जैसे शेर, बैल, हिरण, बिच्छू, सांप बनकर भगवान महावीर पर उपसर्ग का वृत्तांत दर्शाया। इसी कड़ी में भगवान के ज्ञान कल्याणक में समोशरण की रचना की गई, जिसमें माता जी, महाराज जी, तृयंच जीव, इंद्र इंद्राणी, एक इंद्रिय जीव, दो इंद्रिय जीव सभी उपास्थित थे। अंत में भगवान महावीर को केवल ज्ञान के पश्चात् हुए मोक्ष प्राप्ति को भी दिखाया गया। सभी को जानकारी हो कि जैन परंपरा में धर्म की स्थापना करने को तीर्थंकर जैसे महापुरुष अवतार लेते हैं।

जैनागमों में प्रत्येक तीर्थंकर के जीवनकाल में पाँच प्रसिद्ध घटनाओं या अवसरों का उल्लेख मिलता है, वे अवसर जगत के लिए अत्यंत कल्याणकारी होते हैं, इन्हें ही कल्याणक कहते हैं। ये कल्याणक पांच होते हैं, इसलिए पंच कल्याणक कहते हैं। ये पांच कल्याणक हैं – गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, तप कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक। अतः उनका स्मरण दर्शन भावों को जागृत करता है व सही दिशा में उन्हें मोड़ सकता है।

जब तीर्थंकर प्रभु की आत्मा माता के गर्भ में आती है तो भगवान के गर्भ में आने से छह माह पूर्व से लेकर जन्म पर्यन्त 15 मास तक उनके जन्म स्थान में कुबेर द्वारा प्रतिदिन तीन बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती है। यह भगवान के पूर्व अर्जित कर्मों का शुभ परिणाम है, इस अवसर को गर्भ कल्याणक कहते हैं। इस अवसर पर दिक्ककुमारी देवियाँ माता की परिचर्या व गर्भशोधन करती हैं। इसके बाद भगवान होने वाली आत्मा का जब सांसारिक जन्म होता है तो देवभवनों व स्वर्गों आदि में स्वयं घंटे बजने लगते हैं और इंद्रों के आसन कम्पयमान हो जाते हैं। यह सूचना होती है इस घटना की कि भगवान का सांसारिक अवतरण हो गया है। सभी इंद्र व देव भगवान का जन्मोत्सव मनाने पृथ्वी पर आते हैं, इस शुभ अवसर को जन्म कल्याणक के रूप में मनाते हैं।


इसी श्रृंखला में जब तीर्थंकर सब कुछ त्यागकर वन में जाकर मुनि दीक्षा ग्रहण करते है तो इसे तप कल्याणक के रूप में जानते हैं। तप करते-करते जब तीर्थंकर को केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है, तो इस अवसर को ज्ञान कल्याणक कहते हैं। जैन धर्म में मोक्ष का अर्थ है पुद्ग़ल कर्मों से मुक्ति। जैन दर्शन के अनुसार मोक्ष प्राप्त करने के बाद जीव (आत्मा) जन्म मरण के चक्र से निकल जाता है और लोक के अग्रभाग सिद्धशिला में विराजमान हो जाती है।

सभी कर्मों का नाश करने के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती हैं। जब भगवान शरीर का त्यागकर अर्थात सभी कर्म नष्ट करके निर्वाण/ मोक्ष को प्राप्त करते हैं तो वह है आखिरी कल्याणक- मोक्ष कल्याणक।
उत्तम सत्य धर्म के बारे में जानकारी वीडियो के माध्य्म से आरु जैन, आन्या जैन और विदित जैन ने प्रस्तुत की। सांध्य कालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत मंगलाचरण से की गई, जिसकी प्रस्तुति ईशिता जैन ने की। तत्पश्चात आज के धर्म की कहानी दिखाकर बच्चों से उस कहानी से संबंधित पांच प्रश्न ऑनलाइन तथा ऑफलाइन पूछे गए। इस दौरान मंच संचालन परिणति जैन ने किया।


समस्त कार्यक्रमों का ऑनलाईन प्रसारण ज़ूम एप्प के माध्यम से किया जा रहा है। समस्त कार्यक्रम की तकनीक व्यवस्था और आयोजन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन समिति में अनुुु भू ति जैन , श्रीमती ऋतु जैन ,सुप्रीत जैन, दीपक जैन एवं अमित जैन ने सराहनीय योगदान दिया । बुधवार को कार्यक्रम क्रांतिनगर पाठशाला के बच्चों की प्रस्तुति- नुक्कड़ नाटक- धर्म और जीवन। इस नाटिका के माध्यम से यह बताया गया है कि आधुनिकता की चकाचौंध में हम धर्म से धीरे-2 विमुख होते जा रहे थे, लेकिन जैन संस्कार शाला ने बच्चों को धर्म से जोड़े रखने के लिए एक प्रयास किया है, उसे इस नुक्कड़ नाटक के माध्यम से दिखाया जाएगा।

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