आमलकी एकादशी का व्रत करने से मिलती है सौ गाय दान करने का पुण्य, जाने यहां

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हिन्दू पंचाग के मुताबिक आमलकी एकादशी (Ekadashi Vrat)फाल्गुन माह के षुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है। इसे आमलक्य एकादशी भी कहते है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी के मुातबिक आमलकी का मतलब आंवला होता है। जिसे हिन्दू धम्र और आयुर्वेद दोनों में श्रेष्ठ बताया गया है।

पद्म पुराण में आंवले के वृक्ष को भगवान श्री हरि विष्णु को अत्यंत प्रिय बताया गया हे। मान्यता के अनुसार आंवले के वृक्ष में श्री हरि व लक्ष्मी जी का वास माना जाता हे। आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होने की वजह से उसी के नीचे भगवान का पूजन किया जाता है।

इसी वजह से यह एकादशी (Ekadashi Vrat)आमलकी एकादशी कहलाती है। इस दिन आंवले का उबटन, आंवले जल से स्नान, आंवला पूजन, आंवले का भोजन और आंवले का दान करना चाहिए। इसके अलावा इस एकादषी को जो भी व्रत-पूजन करता है उसे सौ गाय दान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

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आमलकी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

प्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्व था। सभी प्रजाजन एकादशी का व्रत करते थे। वहीं राजा की आमलकी एकादशी के प्रति बहुत अधिक श्रद्धा थी। एक दिन राजा शिकार करते हुए जंगल में बहुत दूर निकल गए तभी कुछ जंगली और पहाड़ी डाकुओं ने राजा को घेर लिया।

इसके बाद डाकुओं ने शस्त्रों से राजा पर हमला कर दिया। मगर देव कृपा से राजा पर जो भी शस्त्र चलाए जाते वो पुष्प् में बदल जाते। डाकुओं की संख्या अधिक होने से राजा संज्ञाहीन होकर धरती पर गिर गए। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुए और समस्त राक्षसों को मारकर अदृश्य हो गई। जब राजा की चेतना लौटी तो उसने सभी राक्षसों को मरा हुआ पाया।

यह देखकर राजा को आश्चर्य हुआ कि इन डाकुओं को किसने मारा। तभी आकाशवाणी हुई हे राजन यह सब राक्षस तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने के प्रभाव से मारे गए हे। तुम्हारी देह से उत्पन्न आमलकी एकादशी की वैष्णवी शक्ति ने इनका संहार किया है।

इन्हें मारकर वहां पुनः तुम्हारे शरीर में प्रवेकर गई। यह सुनकर राजा प्रसन्न हुआ और वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व बताया। आमलकी एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। उनकी पूजा से हर मनोकामना पूरी होती है। पुराणों में भी इस एकादशी का महत्व बताया गया हैं।

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