श्री रामकथा के माध्यम से सोशल मीडिया पर श्रद्धालु हो रहे भाव-विभोर

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बिलासपुर.सोशल मीडिया फेसबुक के अ माध्यम से पुरुषोत्तम मास में आयोजित संगीतमय श्री राम कथा के अष्टम दिवस का प्रारम्भ केवट संवाद द्वारा किया। जब राम लक्ष्मण सीता जी जब केवट के पास जाते हैं

तो केवट नदी पार कराने के बदले उतराई लेने से मना कर देते हैं कहते हैं प्रभु मेरा और आपका काम तो एक ही है । मैं नदी पार कराने वाला केवट हूं और आप समस्त संसार को भवसागर से पार करने वाले और जैसे एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर से फीस नहीं लेता एक नाई

दूसरे नाई से रुपए नहीं लेता। ऐसे में केवट भवसागर से पार कराने वाले प्रभु से एक नदी पार कराने के बदले उतराई में अपने जीवन को भवसागर से पार करने की विनती करता है ।

कल जब मैं आपके पास आऊं तो आप मुझे इस भवसागर से पार कर देना। राम और भरत मिलाप का प्रसंग भी बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया वैसे तो रामायण में कई प्रसंग है जो बहुत मार्मिक है

किंतु आज भी कई बहुत समय बाद कोई प्रेम भाव से मिलता है तो यही कहा जाता है देखो भरत मिलाप हो रहा है ।राम जब 14 बरस के वनवास को जाते हैं तब भरत और राजकुमार शत्रुघ्न अपने नानाजी के घर गये हुए थे

उन्हें इन सब घटनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी अपने पुत्र राम के वियोग में महाराज दशरथ की मृत्यु हो गयी और ये दुखद समाचार सुनकर जब राजकुमार भरत और राजकुमार शत्रुघ्न वापस आए,

तो उन्हें अपने बड़े भाई भगवान राम के साथ घटित हुई इस घटना के बारे में पता चलाण् उनके ऊपर मानो दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा हो क्योंकि एक ओर पिता की अकस्मात मृत्यु हो गयीए तो दूसरी ओर जहाँ ये आशा थी

कि पिता की मृत्यु के बाद पिता समान बड़े भाई राम की छत्रछाया में रहने से शांति मिलेगी वो आशा भी उनसे छिन चुकी थी। भरत राजगद्दी पर बैठने से इंकार कर देते हैं कि अयोध्या के राजा तो केवल राम हैं।

माता कैकई के पुत्र होने पर अपने को धिक्कारते हैं। कैकई को भी गलती का एहसास होता तब भारत तीनों माताएँ, कुल गुरु, महाराज जनक और अन्य श्रेष्ठी जन ये सभी मिलकर प्रभु श्री राम को वापस अयोध्या ले जाने के लिए आते हैं।

जैसे ही राजकुमार भरत अपने बड़े भाई श्री राम को देखते हैं, वे उनके पैरों में गिर जाते हैं और उन्हें दण्डवत प्रणाम करते हैंए साथ ही साथ उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बहती हैं।

भगवान राम भी दौड़ कर उन्हें ऊपर उठाते हैं और अपने गले से लगा लेते हैं, दोनों ही भाई आपस में मिलकर भाव विव्हल हो उठते हैं, अश्रुधारा रुकने का नाम ही नहीं लेती। ये है त्याग ।

आज होने वाली हर परिस्थिति के लिए राम ने इतने वर्षों पहले ही अपने कथा के माध्यम से आदर्श उदाहरण प्रस्तुत कर दिया था जिनसे हम प्रेरणा ले कर उनके दिखाये मार्ग पर चल सकें। आज तो भाई भाई में नही बनती।

पैसा, प्रॉपर्टी, पावर पाने की प्रतिस्पर्धा होती है उस के लिए कोई किसी की जान लेने में पीछे नही हटता। जबकि राम और भरत में तो त्याग की प्रतिस्पर्धा हो रही थी। राम ने भरत के लिए केवल राजगद्दी ही नही बल्कि सब कुछ त्याग दिया तो वहीं भरत भी राजा बनने को तैयार नही।

राम तो वन गए थे पर भरत ने तो महल में रह कर अपने मन को ही वन बना लिया था। और राम की चरण पादुका को सिंहासन पर रख कर एक सेवक की भांति राज्य संचालित कर रहे थे। वन जाने से नही भगवान नही मिलते बल्कि अपने मन को ही वन बनाने से भगवान की प्राप्ति होती है।

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