शीतला अष्टमी पर माता से शीतलता प्रदान करने की कामना करेंगे श्रद्धालु, जाने व्रत की तिथि व महत्व

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होली पर्व के आठवें दिन यानी की चैत्र मास की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी मनाई जाती है। इस बार यह व्रत 4 अप्रैल को पड़ रहा है। शीतला अष्टमी को बसोड़ा भी कहा जाता है। अष्टमी तिथि से एक दिन पहले यानी सप्तमी तिथि को ही शीतला अष्टमी के लिए प्रसाद का भोजन बनाया जाता है। उसे बसौड़ा कहा जाता है।

इस दिन लोग बासी भोजन ही खाते है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि शीतला अष्टमी पर माता शीतला को मुख्य रूप से दही, रबड़ी, चावल, हलवा, पूरी, गुलगुले का भोग लगाया जाता है। इसी को स्वयं भी ग्रहण किया जाता है। इस लेख से व्रत की तिथि, महत्व व पूजा विधि बताएंगे।

शीतला अष्टमी का महत्व

मान्यता है कि शीतला अष्टमी से ही ग्रीष्मकाल की शुरुआत हो जाती है। इस दिन से ही मौसम तेजी से गर्म होने लगता है। शीतला माता के स्वरूप को शीतलता प्रदान करने वाला कहा गया है।

सिर्फ यही नहीं, कहा जाता है कि माता शीतला का व्रत करने से चेचक, खसरा व नेत्र विकार जैसी समस्याएं ठीक हो जाती है। यह व्रत रोगों से मुक्ति दिलाकर आरोग्यता प्रदान करता है।

पूजा का मुहूर्त

शीतला अष्टमी की तिथि 4 अप्रैल को है जो सुबह 4 बजकर 12 मिनट से 5 अप्रैल रात के 2 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। इस तिथि में माता शीतला की पूजा‘-अर्चना, श्रृंगार व भोग अर्पित कर माता की कथा सुनना चाहिए।

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