दान का सबसे बड़ा महापर्व है छेरछेरा, जाने छत्तीसगढ़ के लोक पर्व के विषय में

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छत्तीसगढ़ अपने लोक संस्कृति व लोक परंपराओं की दृष्टि से काफी समृद्ध माना जाता है। इस लेख के माध्यम से हम प्रदेश के एक महत्वपूर्ण व अन्न से सबंधित लोक पर्व छेरछेरा के विषय में बताएंगे।

छेरछेरा के पर्व को दान का महापर्व भी माना जाता है। यह पर्व पौष मास की पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व में प्रदेश के अन्नदाता कृषि कार्य की पूर्णता के बाद उत्सव मनाते है और अपने उपज का कुछ हिस्सा लोगों को बांटकर दान की परंपरा को निभाते है।

इस पर्व को अन्नदान का महापर्व माना जाता है। इस दिन बच्चे-बूढे़, महिलाएं सभी टोली बनाकर प्रत्येक घर अन्न मांगने जाते है। लोग उन्हें अन्न का दान दे कर विदा करते है। छत्तीसगढ़ में अनेकों ऐसे पर्व है जो लोगों को एक अच्छी सीख देती है।

इसकी वजह है कि छत्तीसगढ़ के लोग आपस में प्रेम और सादगी से जीवन यापन करते है। छत्तीसगढ़ में पूरे वर्ष भर त्योहार ही त्योहार है मानो धागे में पिरोया हुआ एक माला हो। छेरछेरा का पर्व खरीब की फसल काटकर किसान घर में धान भरने के बाद मनाते है। लोग अपने धन का दान करने में अपना हित मानते है यही वजह है कि लोग इस दिन दान करने में अपने आप को सौभाग्यशाली मानते है।

28 को मनाया जाएगा यह पर्व

छेरछेरा का पर्व हर वर्ष पौष माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस समय किसान अपने धन का दान करते है। इस वर्ष यह पर्व 28 जनवरी को मनाया जाएगा।

प्रकृति से जुड़ा है प्रत्येक पर्व

छेरछेरा हो या कोई और भी लोक पर्व। प्रदेश में प्रत्येक पर्व का महत्व है और सभी पर्व किसी न किसी तरह से प्रकृति से जुड़े हुए है। यहां पर कृषि का कार्य महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वजह से प्रकृति के आधार पर ही प्रत्येक पर्व मनाया जाता है।

इस पर्व के विषय में जन श्रुति है कि एक समय धरती पर घोर अकाल पड़ा। अन्न, फल-फूल व औषधि उपज नहीं रही थी। इससे मनुष्य के साथ जीव-जंतु व अन्य प्राणी भी तरस गए। चारों ओर त्राहि-त्राहि मची हुई थी।

ऋषि-मुनि समेत आमजन भूख से थर्रा गए । तभी आदि देवी शक्ति शाकंभरी की पुकार की गई। शाकंभरी देवी प्रकट होकर अन्न, फल, फूल व औषधि का भंडार दे गई। इससे ऋषि-मुनि समेत आमजनों की भूख व दर्द दूर हो गई। इसी याद में छेरछेरा का पर्व मनाया जाता है।

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