छठ पूजा की आज से हो गई शुरुआत, जाने छठ पूजा की पौराणिक कथा

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छठ पूजा की शुरुआत 18 नवंबर से हो गई। संतान प्राप्ति और संतान की मंगलकामना की इच्छा से रखा जाने वाला यह व्रत कठिन व्रतों में से एक है। इस पर्व की तैयारियां कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाती है। जिस तरह से प्रत्येक व्रत व पूजन में विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है वैसे ही इस व्रत में भी विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है। इस लेख के माध्यम से हम व्रत के महत्व व व्रत की पौराणिक कथा के विषय में बताएंगे।

छठ व्रत पूजन की सामग्री

नए वस्त्र जैसे सूट, साड़ी और पुरुषों के लिए कुर्ता-पजामा या उन्हें जो सुविधाजनक लगे।

छठ पूजा का प्रसाद रखने के लिए बांस की दो बड़ी-बड़ी टोकरियां खरीद ले।

सूप ये बांस या पीतल के हो सकते है।

दूध तथा जल के लिए एक ग्लास, एक लोटा और थाली। गन्ने जिसमें पत्ते लगे हो।

नारियल जिसमें पानी हो।

चावल, सिंदुर, दीपक और धूप। हल्दी, मूली और अदरक का हरा पौधा।

बड़ा वाला मीठा नींबू, शरीफा, केला और नाशपाती।

शकरकंदी तथा सुथनी। पान और साबूत सुपारी।

शहद, कुमकुम, चंदन, अगरबत्ती या धूप तथा कपूर।

मिठाई, गुड़, गेहूं और चावल का आटा।

छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथा

छठ पर्व पर छठी माता की पूजा की जाती है। जिसका उल्लेख ब्रम्हवैवर्त पुराण में भी मिलता है। एक कथा के अनुसार प्रथम मनु स्वायम्भुव के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। इस वजह से वे दुखी रहते थे।

महर्षि की आज्ञा अनुसार, राजा ने यज्ञ कराया। इसके बाद महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन दुर्भाग्य से वह शिशु मृत पैदा हुआ। इस बात से राजा और अन्य परिजन बेहद दुर्खी थे।

तभी आकाश से एक विमान उतरा जिसमें माता षष्ठी विराजमान थी। जब राजा ने उनसे प्रार्थना की तब उन्होंने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं ब्रम्हा की मानस पुत्री षष्ठी देवी हूं।

मैं विश्व के सभी बालकों की रक्षा करती हूं और निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हूं। इसके बाद देवी ने मृत शिशु को आशीष देते हुए हाथ लगाया।

जिससे वह जीवित हो गया। देवी की इस कृपा से राजा बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने षष्ठी देवी की आराधना की। ऐसी मान्यता है कि इसके बाद से ही धीरे-धीरे हर ओर इस पूजा का प्रसार हो गया।