श्री कृष्ण जन्म और संवेदना- जैन मुनि पंथक

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बिलासपुर- मंगलवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर टिकरापारा स्थित जैन भवन में चल रहे आनलाइन चातुर्मास प्रवचन में मुनिश्री पंथक ने बताया कि आमतौर पर प्रत्येक व्यक्ति ने अपने जन्मदिन को एक बड़ा उत्सव जैसा बना दिया है । सब अपनी अपनी हैसियत से मनाते भी हैं । परंतु इस जगत में एक विभूति ऐसी भी है , जिसका जन्मदिन सिर्फ और सिर्फ उसके परिवारजन और मित्रगण ही नहीं मनाता अपितु , हर एक समाज के हर एक व्यक्ति और छोटे हो या बड़े अमीर हो या गरीब सभी इस जन्मदिन को मनाते हैं ।

मुनिश्री ने आगे बताया यह कुछ सौ, सवा सौ साल से ही नहीं बल्कि पिछले 55 सौ सालों से समग्र भारत देश व विदेशों में भी मनाया जाता है । इस विभूति का नाम है श्री कृष्ण महाराज। श्री कृष्ण का जन्म आज से 55 सौ वर्ष पूर्व सावन मास रोहणी नक्षत्र में और रात्रि में हुआ था । यह जन्म कारावास के अंधेरे कोठरी में हुआ था । रात भी काली थी, और उसकी काया भी काली थी, उनका जन्म भी भारत वर्ष के ऊपर जुर्माना और अत्याचार के काले अंधेरे को दूर करने के लिए हुआ था ।

बहन देवकी को जेल की कोठरी में बंद रखा है और देवकी माता का गर्भावस्था आठवां महीना चल रहा था । एक महीने की देर है ऐसा सोचकर संत्री और पहरेदार चैन से सोए हुए थे ।माता देवकी व पिता वासुदेव जाग रहे थे , यानी कि अधर्म सोया हुआ था और धर्म जाग रहा था । आज समस्त जगत श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी मना रहा है । लेकिन माता देवकी और पिता वासुदेव की मनोदशा क्या रही होगी । उस मनोदशा को हम संवेदना के माध्यम से ही अनुभूत कर सकते हैं । जिसमें सात सात पुत्रों का गवा दिया । कंस राजा से डर के मारे कोई भी स्नेही इस आठवें बालक को छुपा के रखने के लिए तैयार नहीं होने की वजह से पिता वासुदेव बालक को लेकर जमुना नदी पार कर गोकुल गांव में जाते हैं । जहां नंद बाबा यशोदा जी बड़े चाव से बालक श्री कृष्ण को रखने तैयार हो गए । आश्रय देने का आनंद की संवेदना प्रकट करते हैं ।
आज की गोचरी मनीष शाह एवं परिवार को लाभ मिला । इस अवसर पर राजू तेजाणी, देवेंद्र कोठारी, गोपाल वेलाणी उपस्थित थे ।



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