छत्तीसगढ़ में मित्रता का पर्व है भोजली, जाने इस लेख में

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फ्रेण्डशिप डे के बारे में तो बहुत सुना है जिसे विश्व स्तर पर मनाया जाता है। लेकिन यह पर्व हमारे प्रदेश छत्तीसगढ़ में सदियों से मनाया जा रहा है। जिसे लोग भोजली पर्व के रूप में मनाते है। भोजली का पर्व रक्षा बंधन के दूसरे दिन यानी कि भाद्र पद प्रतिपदा को मनाया जाता है। आज हम इस लेख के माध्यम से भोजली पर्व यानी की छत्तीसगढ़ के फ्रेण्डशिप डे के विषय में बताएंगें।
प्रदेश में यह लोक पर्व के तौर पर मनाया जाता है। मित्र बनाने और मित्रता निभाने की सांस्कृतिक परंपरा रही है। त्रेतायुग में भगवान श्री राम ने मित्रता पर्व की शुरुआत की थी। केंवट को भगवान श्री राम ने मित्र बनाया था। जिसे प्रदेश के लोगों ने भी माना और आज भी यह परंपरा चली आ रही है। यह पंरपरागत मित्रता ऐसी होती है कि इससे आगे खून के रिश्ते फीके पड़ जाते है। जहां एक ओर लोग अपने ही भाई को संपत्ति के लिए मार देते है वहीं आज मितान की परंपरा अनोखी है। यह पर्व इस वर्ष 4 अगस्त को मनाई जाएगी।

भोजली पर्व का अर्थ

भोजली यानी भो-जली। इसका अर्थ है भूमि में जल हो। यही कामना करती है महिलाएं इस गीत के माध्य मसे। इसलिए भोजली देवी को अर्थात् प्रकृति की पूजा करती है। छत्तीसगढ़ में महिलाएं धान, गेहूं, जौ या उड़द के थोड़े दाने को एक टोकनी में बोती है। उस टोकनी में खाद मिट्टी पहले रखती है। उसके बाद सावन शुक्ल नवमीं को बो देती है। जब पौधे उगते है। उसे भोजली देवी कहा जाता है। रक्षाबंधन के बाद भोजली को ले जाते है नदी में और वहां उसका विसर्जन करते है।

पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते है मित्रता

मितान को रिश्ते से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हर सुख-दुख व हर जगह कार्यक्रम में पूरे परिवार सहित पहुंचते है। एक भाई से बढ़कर इस रिश्ते को जीवन भर निभाते है। दूसरी पीढ़ी भी उस रिश्ते को उसी सिद्दत के साथ निभाती है।

भोजली विसर्जन के दौरान बनाते है मित्र

मित्र बनाने की परंपरा को छत्तीसगढ़ में मितान या मितानिन बदना कहा जाता है। इस बदना का मतलब है एक रतह से अनुबंध की औपचारिकता दो पुरुष या दो महिलाएं आपस में एक-दूसरे को मितान बनाने के लिए एक दिन नियत करते है और मितान बद लेते है। अधिकतर लोग भोजली पर्व के दिन ही भोजली विसर्जन करते हुए घाट या तालाब के किनारे ही भोजली या फूल का आदान-प्रदान करते है। वहीं कुछ लोग गंगा जल या तुलसी के पत्तों का भी आदान-प्रदान कर मितान या मित्र बनाते है।

प्रकृति की पूजा करते है


भोजली पर्व के माध्यम से प्रकृति देवी की पूजा की जाती है। पांच तरह के अनाज से भोजली उगाकर उसकी विधि-विधान से पूजा करते है। भोजली को प्रकृति देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। मान्यता है कि प्रकृति देवी की पूजा करते हुए कृषि कार्य बेहतर हो इसकी कामना करते है। अच्छी फसल के साथ सुख-समृद्धि की भी कामना की जाती है।

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