रतनपुर के द्वारपाल के नाम से प्रचलित है भैरव बाबा, जाने कैसे

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छत्तीसगढ़ में पौराणिक नगरी के नाम से प्रचलित रतनपुर में आदिशक्ति मां महामाया विराजमान है। वहीं उनके अलावा भी अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिर है।

जिनका अपना अलग महत्व है। उनमें से ही एक है भैरवबाबा का मंदिर। भैरवबाबा को आदिशक्ति का द्वारपाल कहना गलत नहीं होगा।

क्योंकि जब रतनपुर में मां महामाया के दर्शन के लिए जाते है तो सबसे पहले भैरवबाबा का मंदिर है। जिसे पार करके ही आगे प्रस्थान किया जाता है।

भैरव बाबा का मंदिर बहुत प्राचीन है माना जाता है कि ये रतनपुर में द्वारपाल की तरह है। यहां जो भी आता है इनकी कृपा से ही मंदिरों तक पहुंचता है।

जब मां महामाया के दर्शन करके लोग लौटते है तब इनका दर्शन करना भी अनिवार्य होता है। जब तक भैरवबाबा के दर्शन श्रद्धालु नहीं करते है तब तक देवी मां का आशीर्वाद नहीं मिलता है।

११ वीं शताब्दी का है यह मंदिर

मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम ने ही मां महामाया मंदिर के निर्माण के समय ही कराया था। पहले यहां पर मंदिर नहीं सिर्फ चबुतरा था। बाद में मंदिर का निर्माण बाबा ज्ञानगिरी गोसाई ने कराया।

मंदिर में स्थापित प्रतिमा कब की है इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है। एेसा माना जाता है जब सती का दाहिना स्कंद गिरा तब ही भैरव मूर्ति रक्षक बनकर स्थापित हो गए।

इनका दर्शन भी आदिशक्ति के दर्शन के बाद ही करने की पंरपरा है।

https://youtu.be/8Hwc4vkVIsk

रौद्र रूप में है भैरव बाबा

मंदिर में स्थापित मूर्ति १० फीट ऊंची है। जो रौद्र रूप में है। यह रौद्र रूप दृष्टों के लिए और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए है। इनके दर्शन मात्र से शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर होते है। भक्तों की प्रार्थना कभी विफल नहीं होती है।

जहां होती है देवी वहां विराजते है कालभैरव

पुराणों में भी उल्लेख मिलता है कि जहां भी मां आदिशक्ति विराजमान होती है वहां पर भैरवबाबा का भी वास होता है। इसी मान्यता को ध्यान में रखते हुए कल्चुरी राजाओं ने जब रतनपुर में मंदिर बनवाया तो इनकी स्थापना की गई।

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