राजा परीक्षित के मोक्ष की कथा के साथ हुआ भागवत महापुराण का विश्राम

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बिलासपुर. श्रीमद् भागवत कथा के विश्राम दिवस कथा क्रम में आचार्य अमर कृष्ण शुक्ला ने आज श्री कृष्ण के अन्य विवाह, सुदामा चरित्र, राजा परीक्षित मोक्ष का वर्णन किया जिसे समस्त भक्तों ने पूरे भक्ति भाव से श्रवण किया।

तत्पश्चात फूलहोली महोत्सव में समस्त भक्त जनों ने श्री राधा कृष्ण की जीवंत झांकी का भजनों के साथ झूम के नृत्य करते हुए आनंद लिया। आचार्य अमर कृष्ण ने सुदामा चरित्र का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया

जिसे सुनकर उपस्थित श्रोता भाव-विभोर हो उठे। उन्होंने शिक्षा दी कि निस्वार्थ प्रेम भाव हमें हर रिश्ते में रखना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण और सुदामा की सच्ची मित्रता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि श्री कृष्ण उदारता के प्रतीक हैं तो वहीं सुदामा जी संतोष के।

सुदामा और कृष्ण की जीवंत झांकी भी प्रस्तुत की गई। कथा क्रम को आगे बढ़ाते हुए बताया कि किस तरह भगवान ने अपने यदुकुल को ब्राह्मणों का श्राप लगवाया और पिता वसुदेव को नारदजी से सत्संग कराकर स्वयं स्वधाम गमन किया।

निरंतर प्रभु की कथा श्रवण और सत्संग की शिक्षा प्रदान की। ईश्वर ने हमें यह जीवन रूपी नौका प्रदान की हैए लेकिन जब तक हमें नाव चलाने वाले सद्गुरु नहीं मिलेंगे जो हमें भक्ति मार्ग की ओर अग्रसर करें तब तक हमारी जीवन की नौका इस भवसागर से पार नहीं हो सकती।

ईश्वर तो आत्मा रूप से हम सबके अंदर विद्यमान हैं और यह आत्मा उस परमात्मा की ही अमानत है जिसे हमें उसी को सौंपना है। जीवन की सारी जिम्मेदारी पूर्ण कर अंत में इस आत्मा को भी उस परमात्मा को सौंपकर अपनी आखरी जिम्मेदारी भी पूर्ण करनी है।

ईश्वर ने एक-एक करके सबके अहंकार को नष्ट किया क्योंकि अहंकार के रहते भगवान नही मिलते ।सिर्फ प्रेम और सरलता से ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। जब कामदेव का अहंकार तोड़ा तब कामदेव ने प्रभु को अच्युत नाम प्रदान किया जिसका अर्थ है

जो किसी भी स्थिति में गिर नहीं सकता , जो स्थिर है ।कभी मनुष्य को अभिमान करना हो तो अपने प्रभु के नाम पर करेंए उन पर अहंकार करें। सत्संग और कथा की महिमा बताते हुए बताया कि प्रभु के साक्षात दर्शन होने पर भी सत्संग और निरंतर कथा श्रवण

करने से प्रभु कभी हमें छोड़कर अन्यत्र नहीं जाएंगे और उनकी कृपा हमेशा हम पर बनी रहेगी, ईश्वर की शाश्वत प्राप्ति होगी । जब तक मूर्ति बाजार में है तब तक वह पत्थर है किंतु जब वो विग्रह हमारे घर आ जाए और हम उसका पूजन करने लगे तो उसमें ईश्वर के होने का भाव रखना जरूरी है,

तभी हमें प्रभु प्राप्त होंगे। परीक्षित जी ने सुखदेव जी से कथा सुनकर अपना आखिरी प्रणाम उनके चरणों में कर मृत्यु के भय से मुक्त हो प्रभु की ध्यान समाधि में बैठकर तक्षक नाग के डसने से पहले ही अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन कर दिया। इस प्रकार श्री भागवत कथा हमें मृत्यु के भय से बचाती है ।

कथा व्यास अमर शुक्ला जी ने अंतिम श्लोकों का वर्णन करते हुए भगवान के श्री चरणों में समस्त भक्तों की ओर से प्रणाम करते हुए कामना की कि हे प्रभु !बस इतनी कृपा करना कि इस कथा को सुनने के बाद हमारा शरीर चाहे जहां जाए परंतु आपके चरण अब हमारे ह्रदय को छोड़कर कहीं ना जाए।

आप सदा सर्वदा हमारे हृदय में निवास करें। तथा प्रभु का नाम संकीर्तन सारे पापों से और प्रणाम जीवन के दुखों से बचाता है इसलिए सदैव ईश्वर का नाम व प्रणाम जीवन में बना रहना चाहिए ।प्रभु का वंदन जीवन के समस्त बंधनों से मुक्त कर देता है ।

अंत में आचार्य अमर कृष्ण जी ने व्यासपीठ से समस्त भक्तों को स्वस्थ सुखी जीवन और ईश्वर की शाश्वत प्राप्ति का आशीर्वाद प्रदान करते हुए अपनी वाणी को विराम दिया। कृष्ण रुक्मणि झांकी में सब भक्तों के साथ फूल होली का आनंद लिया। सब भक्तों को तो ऐसा लगा जैसे वो सच मे कृष्ण रुक्मणि के साथ ही होली खेल रहे हैं।

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