भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते है पापमोचनी एकादशी व्रत करने से, जाने विस्तार से व्रत का महत्व व कथा

0

हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। प्रत्येक माह में 2 एकादशी की तिथि व साल भर में 24 एकादशी की तिथि होती है। जब अधिकमास होता है तो इसकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है। ज्योतिषाचार्य एवं वास्तुविद मनोज तिवारी ने बताया कि एकादशी की तिथि श्री हरि विष्णु को अतिप्रिय है।

उनकी पूजा-अर्चना इस तिथि में करना सबसे उत्तम होता है। उन्हीं एकादशी की तिथि में से एक है पापमोचनी एकादशी। इसे पापों की मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से श्रीहरि विष्णु के कृपा से भक्त के समस्त पाप नष्ट हो जाते है। 7 अप्रैल को पाप मोचनी एकादशी का व्रत किया जाएगा

पापमोचनी एकादशी का महत्व

चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पापमोचनी एकादशी का महत्व खुद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया था।

भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि जो व्यक्ति इस व्रत को रखता है उसके समस्त पाप खत्म हो जाते है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि एकादशी व्रत को विधि-विधान से रखने से मनोकामनाएं पूरी होती है।

पूजा की विधि

-एकादशी के दिन सबसे पहले सुबह उठकर स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करके एकादशी व्रत का संकल्प ले।

-उसके बाद घर के मंदिर में पूजा करने से पहले एक वेदी बनाकर उस पर 7 धान(उड़द, मूंग, गेहूं, चना, जौ, चावल और बाजरा) रखे।

-वेदी के ऊपर एक कलश की स्थापना करे और उसमें आम या अशोक के 5 पत्ते लगाए।

– अब वेदी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर रखे।

-इसके बाद भगवान विष्णु को पीले फूल, ऋतुफल और तुलसी दल अर्पित करे।

-फिर धूप-दीप से विष्णु की आरती उतारे। -शाम के समय भगवान विष्णु की आरती उतारने के बाद फलाहार ग्रहण करे।

-रात्रि के समय सोए नहीं बल्कि भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करे।

-अगले दिन सुबह किसी ब्राम्हण को भोजन कराएं और यथा शक्ति दान-दक्षिणा देकर विदा करे।

-इसके बाद खुद भी भोजन कर व्रत का पारण करे।

व्रत की कथा

पापमोचनी एकादशी की महिमा के बारे में स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को बताया था। उन्होंने व्रत की कथा सुनाते हुए कहा एक बार राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है।

लोमश ऋषि ने उन्हें एक कहानी सुनाइ्र कि कैसे चैत्ररथ नामक सुंदर वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि तपस्या में लीन थे। तभी वहां भजुघोषा नामक अप्सरा आई जो ऋषि पर मोहित हो गई और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने के यत्न करने लगी।

उसी समय कामदेव भी वहां से गुजर रहे थे। उनकी नजर अप्सरा पर गई तो उन्होंने भी उसकी मनोस्थिति समझते हुए सहायता की। जिससे अप्सरा अपने प्रयास में सफल हुई और ऋषि काम पीड़ित हो गए। इसके बाद ऋषि शिव की तपस्या भूलकर अप्सरा के साथ रमण करने लगे।

मगर कई वर्षों के बाद जब उनहें अपनी भूल का एकसास हुआ तो उन्हें खुद पर ग्लानि हुई। इसके साथ ही अपना व्रत भंग करने के लिए अप्सरा पर क्रोध आया। जिस वजह से उसे पिशाचनी होने का श्राप दे बैठे। अप्सरा इससे दुखी हो गई और श्राप से मुक्ति के लिए प्रार्थना करने लगी।

इसी समय देवर्षि नारद वहां आए और अप्सरा व ऋषि दोनों को पाप से मुक्ति के लिए पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। नारद द्वारा बताए गए विधि-विधान से दोनों ने पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। जिससे वह पाप मुक्त हो गए और अप्सरा भी पिशाच योनि से मुक्त हुई और अपना सौंदर्य फिर प्राप्त करने के बाद स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गई।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here