51 शक्तिपीठों में एक है आदिशक्ति मां महामाया, जाने मंदिर का इतिहास

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सृष्टि के निर्माण से ही देवी शक्ति का महत्व बताया गया है। यह सत्य भी है जब तक देवी मां की कृपा नहीं मिलती देवता, दानव व मानव कोई भी बल शाली नहीं बन सकता है। इस बात को हम देवी मां के सिद्ध शक्तिपीठों के प्रति भक्तों की आस्था से समझ सकते है। इन्हीं शक्ति पीठों में एक है छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले से 25 किलो मीटर की दूरी पर स्थित रतनपुर स्थित मां महामाया का मंदिर। इस नगरी को शिव व शक्ति की नगरी के तौर भी जाना जाता है।

आदिशक्ति मां महामाया मंदिर के प्रति लोगों की आस्था इतनी है कि नवरात्रि में तो देवी की भक्ति करने के लिए लोग हजारों की संख्या में पहुंचते ही है। इसके अलावा भी साल भर देवी मां के दरबार में देश-विदेश से भक्त मत्था टेकने पहुंचते है। आदिशक्ति मां महामाया की कृपा एेसी है कि यहां आने वाले भक्तों के मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होते है। इस मंदिर का इतिहास भी मंदिर की तरह ही बहुत प्राचीन है। इस मंदिर से जुड़ी बहुत सी बाते है जो भक्तों को यहां लेकर आती है।

माता सती का दाहिना स्कंध गिरा था
पुराणों के मुताबिक प्राचीन कथा है। जब माता सती के पिता दक्ष ने यज्ञ किया था तब भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया था। उस समय माता सती बिना निमंत्रण ही वहां पहुंच गई और अपमानित होकर योग माया से अपने आप को भस्म कर लिया। तब भगवान शंकर सती की मृत्यु से व्यथित होकर उनके मृत शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे। उस समय जहां-जहां भी माता सती का अंग गिरा वहां पर शक्तिपीठों की स्थापना हुई। रतनपुर में मां सती का दाहिना स्कंध गिरा था। यहां आदिशक्ति मां महामाया मंदिर का निर्माण हुआ।

राजा रत्नदेव प्रथम ने बनाया था मंदिर
आदिशक्ति मां महामाया की पूजा-अर्चना आदि काल से ही की जा रही है। लगभग 1 हजार साल पहले त्रिपुरी के कल्चुरी शासक राजा रत्नदेव प्रथम ने 1045 ई में माता के मंदिर का निर्माण कराया। माना जाता है कि राजा को माता ने स्वप्न में दर्शन दिया था। राजा देवी मां का भक्त था और उनकी अधिष्ठात्री देवी थी मां महामाया। माता की कृपा से ही कल्चुरी शासको का इतिहास में नाम है।

नवरात्रि में होती है पूजा-अर्चना
आदिशक्ति मां महामाया की पूजा साल के चारों नवरात्रि में होती है। चैत्र व शारदीय नवरात्रि में भव्य पूजन होता है। वहीं माता की पूजा आषाढ़ व माघ गुप्त नवरात्रि में भी होती है।

० आस्था एेसी की चलते है पैदल मंदिर तक
देवी मां महामाया के प्रति भक्तों की एेसी आस्था है कि चैत्र व शारदीय नवरात्रि में सप्तमी की रात्रि को हजारों की संख्या में श्रद्धालु पैदल ही मंदिर तक का रास्ता तय करते है। एेसा माना जाता है कि जो भी भक्त सच्ची भक्ति से माता से आशीर्वाद मांगता है उसकी मनोरथ अवश्य ही पूर्ण होती है।
० एेसे पहुंचे मंदिर तक
बिलासपुर से कोरबा जाने वाले मार्ग में बिलासपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर रतनपुर नामक शहर में आदिशक्ति मां महामाया मंदिर है। यहां पहुंचने के लिए बस व दो पहिया वाहन इस्तेमाल किया जा सकता है।

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