हरियाली तीज सुहागिनों के लिए क्यों है महत्वपूर्ण, पढ़े कहानी

सावन का महीना शुरू हो गया है। सावन का महीना शिव की पूजा के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। सावन में शिव-पार्वती के पूजन का महत्व होता है। सावन मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को महिलाएं हरियाली तीज कहा जाता हैं। सावन मास के इस तीज को श्रावणी तीज कहते है। परंतु ज्यादातर लोग इसे हरियाली तीज के नाम से जानते है। यह त्योहार मुख्य रूप् से उत्तरभारत में मनाया जाता है। इस लेख के माध्यम से हरियाली तीज के महत्व व व्रत कथा को बताएंगे।


इस व्रत में हरियाली तीज के दिन महिलाएं माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती है। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती है। इस व्रत को करवा चैथ से भी कठिन कहा जाता है। इस दिन बिना भोजन ग्रहण किए व बिना जल ग्रहण किए महिलाएं करती है। दूसरे दिन स्नान और पूजा के बाद व्रत को पूरा करके भोजन ग्रहण करती है।
इस बार यह व्रत 23 जुलाई को किया जाएगा। इसे खास तौर पर मारवाड़ी समाज के लोग करेते है। इस दिन जगह-जगह झूले पड़ते है। इस त्योहार में स्त्रियां हरी लहरिया या चुनरी पर गीत गाती है। मेहंदी लगाती है। श्रृंगार करती है। झूला झुलती है और नाचती है। हरियाली तीज के दिन कई स्थानों में मेले भी लगते है।


0 तीज की कथा
यह हरितालिका तीज की तरह ही व्रत है। जिसे कुछ क्षेत्रों में सावन के शुक्ल पक्ष की तीज की तिथि को मनाया जाता है। माता पार्वती ने काफी कष्ट सह कर भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए इस व्रत को घने जंगलों में अपने सखी के साथ किया था। कथा के मुताबिक पार्वती के पिता पर्वतराज हिमालय अपनी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे लेकिन माता पार्वती शिव को अपना स्वामी मान चुकी थी ऐसे में भगवान शंकर को प्रसन्न करने घने जंगलों में जाकर लगातार कई कष्ट सहते हुए इस व्रत को किया। माता पार्वती के जंगल चले जाने से उनके पिता

उनकी बहुत खोज करते है। तब वे घने जंगल में मिलती है। शिव जी को प्रसन्न कर विवाह का वरदान भी प्राप्त कर लिया था। अपने पिता से अपना विवाह भगवान शिव से करने का निवेदन करती है। पिता बात मान जाते है और धूमधाम से महादेव से विवाह कराते है माता पार्वती का। तब से ही यह व्रत प्रचलित है। अलग-अलग क्षेत्र में इस व्रत को अलग तिथि के मुताबिक करते है।
0 हरा हरियाली का प्रतीक
हरियाली तीज के दिन हरे रंग के वस्त्र धारण करने व उससे संबंधित श्रृंगार करने का भी विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं माता पार्वती व भगवान शंकर की पूजा करती है। श्रृंगार में हरे रंग का वस्त्र, चूड़ियां, बिंदी, मेहंदी लगाती है। सावन के झूले का आनंद लेती है। साथ ही इस दिन श्रृंगार की सामग्री भी सुहागिन महिलाओं को बांटती है।

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