भगवान शिव के पास कैसे आया नाग, डमरू और त्रिशूल, पढ़े कहानी

भगवान शिव का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छवि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की है। इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है। माथे पर अर्धचंद्र और सिर पर जटा जूट जिससे गंगा की धारा बहर रही है। भगवान शिव के इस वेशभूशा को देखकर लगता है कि भोलेनाथ वैरागी ही है। लेकिन इन सबको धारण करने के पीछे का कारण हम इस लेख के माध्यम से बताएंगे।


भगवान शंकर की महिमा ही अलग है। वैरागी शिव को प्रसन्न करना आसान है वे संहारक है और उनकी पूजा-अर्चना हर कोई करता है। मानव, देवता और दानव सभी महादेव की भक्ति करते है। सब पर बिना भेदभाव के महादेव कृपा की करते है। भगवान शंकर के वेशभूशा व आभूषण के विषय में यह पूरा लेख है।


0 ऐसे धारण किया त्रिशूल को
भगवान शिव सर्वश्रेष्ठ सभी प्रकार के अस्त्र-षस्त्रों के ज्ञाता है। लेकिन पौराणिक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्त्रों का जिक्र मिलता है। एक धनुष और दूसरा त्रिशूल। त्रिपुरासुर का वध और अर्जुन का मान भंग, यह दो ऐसी घटनाएं है जहां शिव जी ने अपनी धर्नुविद्या का प्रदर्शन किया था। जबकि त्रिशूल का प्रयोग शिव जी ने कई बार किया है। भगवान शिव ने धनुष का अविष्कार स्वयं किया था। जबकि त्रिशूल के विषय में शिव पुराण में उल्लेख है कि जब सृष्टि के आरंभ में ब्रम्हनाद से शिव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम व सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यहीं तीनों गुण शिव के तीन शूल यानी त्रिशूल बने। इसके बीच सामंजस्य बनाए बगैर सृष्टि का संचालन कठिन था। इसलिए शिव ने त्रिशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण किया।


0 शिव जी का डमरू
भगवान शिव जी को संहारकर्ता के रूप में वेदों और पुराणों में बताय गया है। जबकि शिव का नटराज रूप ठीक इसके विपरीत है। यह प्रसन्न होते है तो नृत्य करते है। इस समय शिव के हाथों में एक वाद्ययंत्र होता है जिसे डमरू कहते है। यह रेत के घड़ी के आकार का होता है जो दिन रात और समय के संतुलन का प्रतीक है। शिव भी इसी तरह के है। इनका एक स्वरूप वैरागी है तो दूसरा भोगी का जो नृत्य करता है। परिवार के साथ जीता है। इसलिए शिव का डमरू सबसे उचित वाद्य यंत्र है। इसे आदि यंत्र भी कहा जाता है। सृष्टि के आरंभ में जब मां सरस्वती प्रकट हुई तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में ध्वनि को जन्म दिया। लेकिन यह ध्वनि सुर और संगीत विहीन थी उस समय भगवान शिव ने नृत्य करते हुए 14 बार डमरू बजाए और इस ध्वनि से व्याकरण और संगीत के ताल का जन्म हुआ। इसे शिव अपने साथ लेकर प्रकट हुए है। इसे ब्रम्हा का स्वरूप कहते है जो सृष्टि को दिखाता है जैसे-जैसे पास आता है वैसे वह संकुचित हो दूसरे सिरे से मिल जाता है।


0 ऐसे आया गले में विषधर नाग
भगवान शिव के साथ हमेशा नाग होता है इस नाग का नाम है वासुकी। इस नाग के बारे में पुराणों में बताया गया है कि यह नागों का राजा है और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इन्होंने रस्सी का काम किया था जिससे सागर को मथा गया था। कहते है वासुकी नाग शिव जी के परम भक्त थे। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने इन्हें नाग लोक का राजा बना दिया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांति लिपटे रहने का वरदान दिया।

7 COMMENTS

  1. अपने आराध्य के बारे में अच्छी जानकारी 💐💐🌿🍃☘️🥀

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