देवशयनी एकादशी से चार माह तक पाताल में शयन करेंगे श्री हरि, जाने कैसे

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देवशयनी एकादशी इस बार 1 जुलाई को पड़ रहा है। इसी दिन से चातुर्मास की शुरुआत होगी। मान्यता है कि इस दिन से जगत के पालनहार प्रभु विष्णु क्षीर सागर में शयन करने जाते है। इस दौरान वैवाहिक कार्य बंद होंगे। कई शुभ कार्य करना भी वर्जित होगा। प्रभु देवशयनी के बाद सीधे देवउठनी एकादशी अथवा देवउठनी ग्यारस के दिन जागेंगे। आखिर देवशयनी एकादशी का क्या महत्व है। क्यों शुभकार्य वर्जित होंगे। इस लेख के माध्यम से बताने का प्रयास है।


पंडित महेश्वर प्रसाद उपाध्याय ने बताया कि इस तिथि को पद्मनाभा भी कहते है। सूर्य देव के मिथुन राशि में आने पर यह एकादशी आती है। इसी दिन से चातुर्मास शुरू हो जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते है। फिर चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर वह जागते है। उसे देवउठनी या देवोत्थानी एकादशी कहते है। पुराणों में वर्णन है कि भगवान विष्णु पाताल लोक के राजा बलि के द्वार पर निवास करते है। इस दौरान सभी शुभ कार्य व मांगलिक कार्य वर्जित रहते है।


० शुभ शक्तियों का तेजत्व हो जाता है कम
चातुर्मास या देव शयन के दौरान का महीना अच्छा महीना माना जाता है। लेकिन सिर्फ पूजन व धार्मिक आयोजनों के लिए। जबकि इस तिथि में मांगलिक व शुभ कार्य वर्जित होता है। इस दौरान चार महीने तक सूर्य, चंद्रमा और प्रकृति का तेजस तत्व कम हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि देवशयन हो गया है। शुभ शक्तियों के कमजोर होने पर किए गए कार्यों के परिणाम शुभ नहीं होते।
० देवशयनी एकादशी का महत्व
एक बार राजा के राज्य में बरसात नहीं हो रही थी। सारे लोग बहुत परेशान थे और अपनी परेशानी लेकर राजा के पास पहुंचे। हर तरफ अकाल था। एेसी दशा में राजा ने भगवान विष्णु की पूजा की। देवशयनी एकादशी का व्रत किया। इसके फलस्वरूप भगवान विष्णु व राजा इंद्र ने बरसात की और राजा के साथ सभी लोगों के कष्ट दूर हो गए

० लगाए तुलसी का पौधा
देव शयनी एकादशी के दिन गमले में तुलसी दल को डाल देना चाहिए। इस दिन लगाए गए तुलसी के दल से तुलसी का पौधा उगता है। चार माह इस पौधे की देखभाल करना चाहिए। इसके बाद जब देव उठनी एकादशी आती है तब इसी तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम से करना चाहिए। इस विधि को करने से घर में कन्यादान के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।

० भगवान शिव करेंगे देख-रेख
पुराणों में बताया गया है कि जब भगवान विष्णु चार माह पाताल में शयन करते है तो सृष्टि का संचालन की जिम्मेदारी भगवान शंकर पर होती है। वे और उनका परिवार ही चार माह तक सृष्टि के संचालन में सहयोग करते है। सावन माह में शिव पूजन, हरितालिका व्रत व गणेश चतुर्थी जैसे व्रत भी इसी दौरान किए जाते है।

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